
MP BOARD की आगामी अर्द्धवार्षिक/ वार्षिक परीक्षा 2026-27 के लिए कक्षा 12 पशुपालन (Animal Husbandry) नोट्स/ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर 2026-27 (MP Board) दिए गए हैं हिंदी के अतिरिक्त इंग्लिश , संस्कृत , भौतिक , रसायन (विज्ञान/ गणित संकाय ) कला संकाय ( इतिहास , राजनीति आदि ) कामर्स संकाय ( एकाउंटेंसी , व्यवसाय अध्ययन ) कृषि संकाय के नोट्स/ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर इस वेबसाईट पर दिए गए है . बोर्ड परीक्षा तक वेबसाईट को दिन में कम से कम एक बार अवश्य चेक करें . नियमित अपडेट होगी .
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अर्द्धवार्षिक/ वार्षिक परीक्षा 2026-27 कक्षा 12 पशुपालन (Animal Husbandry)नोट्स/ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (MP Board)
भाग अ: 1 अंक वाले वस्तुनिष्ठ प्रश्न (कुल: 50 प्रश्न)
1. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
2. रिक्त स्थानों की पूर्ति (Fill in the Blanks)
3. सत्य या असत्य (True or False)
उत्तर: असत्य (सुअर बहुत तेजी से वंश बढ़ाते हैं और एक बार में कई बच्चे देते हैं)
प्रश्न 27. बरबरी (Barbari) को भारत में ‘शहरी बकरी’ (City Goat) के नाम से भी जाना जाता है। (सत्य/असत्य)
उत्तर: सत्य
प्रश्न 28. दूध में पानी की मिलावट करने पर उसका आपेक्षिक घनत्व बढ़ जाता है। (सत्य/असत्य)
उत्तर: असत्य (पानी मिलाने पर दूध का आपेक्षिक घनत्व कम हो जाता है)
प्रश्न 29. अमूल (AMUL) सहकारिता आंदोलन की शुरुआत मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर से हुई थी। (सत्य/असत्य)
उत्तर: असत्य (इसकी शुरुआत आनंद, गुजरात से हुई थी)
प्रश्न 30. खीस (Colostrum) को गर्म करने पर वह फट जाता है और थक्के के रूप में जम जाता है। (सत्य/असत्य)
उत्तर: सत्य (एल्ब्युमिन और ग्लोब्युलिन प्रोटीन की अधिकता के कारण)
4. सही जोड़ी बनाइए (Match the Following)
प्रश्न 31 से 40. कॉलम अ के पशुपालन तथ्यों का कॉलम ब के सही विकल्पों से मिलान करें:
| कॉलम अ | कॉलम ब (सही उत्तर) |
|---|---|
| बरसीम और लूशर्न | ‘हे’ (Hay) चारा बनाने के लिए सर्वोत्तम फसलें |
| पशु प्लेग (Rinderpest) | विषाणु जनित महामारी (पोकनी रोग) |
| गलघोटू रोग | पाश्चुरेला बोविसेप्टिका जीवाणु द्वारा होता है |
| गुणांकन में 75 से 100 अंक | सर्वोत्तम या उत्तम श्रेणी का पशु |
| जमुनापारी (Jamunapari) | भारतीय बकरियों में सबसे बड़ी और तोतामुखी नस्ल |
| कड़कनाथ (Kadaknath) | झाबुआ (M.P.) की काले मांस वाली मुर्गी की नस्ल |
| रानीखेत (Ranikhet) | मुर्गियों का सबसे खतरनाक विषाणु जनित रोग |
| अमूल (AMUL) का पूरा नाम | आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड |
| दूध का सफेद रंग | केसीन (Casein) प्रोटीन की उपस्थिति के कारण |
| गाय के दूध का पीला रंग | कैरोटीन (Carotene) के कारण |
5. एक शब्द / एक वाक्य में उत्तर
प्रश्न 41. पशु आहार में प्रयुक्त होने वाले उस अवयव का नाम बताइए जो हड्डियों और दांतों के निर्माण के लिए सबसे आवश्यक है।
उत्तर: खनिज लवण (मुख्य रूप से कैल्शियम और फास्फोरस)।
प्रश्न 42. साइलेज बनाने वाले गड्ढे या बुर्ज को तकनीकी भाषा में क्या कहा जाता है?
उत्तर: साइलो (Silo)।
प्रश्न 43. पशु चिकित्सा में घावों को धोने और कीटाणुरहित करने के लिए किस सामान्य रसायन का उपयोग लाल दवा के रूप में होता है?
उत्तर: पोटेशियम परमैंगनेट (KMnO₄)।
प्रश्न 44. पशुओं के पैर और मुँह में छाले हो जाना किस रोग का मुख्य लक्षण है?
उत्तर: खुरपका-मुँहपका रोग (Foot and Mouth Disease)。
प्रश्न 45. नर पशुओं की प्रजनन क्षमता को समाप्त करके उन्हें शांत कामगार बनाने की क्रिया क्या कहलाती है?
उत्तर: बधियाकरण (Castration)।
प्रश्न 46. व्यावसायिक भेड़ पालन का मुख्य उद्देश्य क्या प्राप्त करना होता है?
उत्तर: ऊन (Wool) और मांस उत्पादन।
प्रश्न 47. अंडों का कृत्रिम रूप से चूजे निकालने के लिए उपयोग किया जाने वाला तापमान नियंत्रित उपकरण क्या कहलाता है?
उत्तर: इन्क्यूबेटर (Incubator)।
प्रश्न 48. मध्य प्रदेश में डेयरी विकास के लिए उत्तरदायी सहकारी संघ का नाम क्या है?
उत्तर: एम.पी. स्टेट डेयरी कोऑपरेटिव फेडरेशन (सांची ब्रांड)।
प्रश्न 49. शुद्ध दूध की अम्लता (Acidity) सामान्यतः कितनी होती है?
उत्तर: 0.12% से 0.14% के बीच (pH लगभग 6.4 से 6.6)।
प्रश्न 50. दूध को तत्काल खराब होने से बचाने के लिए उसका तापमान 4°C तक कम करने की क्रिया क्या कहलाती है?
उत्तर: दुग्ध अवशीतन (Chilling या Cooling)।
भाग ब: 2 अंक वाले लघु उत्तरीय प्रश्न (कुल: 30 प्रश्न)
प्रश्न 1. पशु आहार में ‘पानी’ (Water) के दो मुख्य कार्य लिखिए।
उत्तर: 1) यह पशु के शरीर के तापमान को नियंत्रित और सामान्य बनाए रखता है। 2) यह खाए गए चारे को पचाने और पोषक तत्वों को पूरे शरीर के अंगों तक ले जाने में मदद करता है।
प्रश्न 2. पशु पोषण के अंतर्गत ‘मोटा चारा’ (Roughage) किसे कहते हैं?
उत्तर: वह चारा जिसमें रेशे (Crude Fibre) की मात्रा 18% से अधिक होती है और कुल पाचक तत्व (TDN) 60% से कम होते हैं, जैसे – भूसा, कुट्टी और सूखा घास। यह पशुओं का पेट भरने के लिए आवश्यक है।
प्रश्न 3. साइलेज (Silage) की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: हरी फसलों को बिना सुखाए, हवा की अनुपस्थिति में गड्ढों (साइलो) में दबाकर नियंत्रित किण्वन (Fermentation) द्वारा तैयार किया गया रसीला और सुपाच्य चारा साइलेज कहलाता है। इसमें हरे चारे के पूरे गुण सुरक्षित रहते हैं।
प्रश्न 4. ‘हे’ (Hay) चारा क्या है? इसकी एक उत्तम फसल का नाम लिखिए।
उत्तर: हरी फसलों को पुष्पन अवस्था में काटकर धूप में इस प्रकार सुखाना कि उसकी नमी 12-15% तक रह जाए और उसके पोषक तत्व व हरा रंग नष्ट न हो, ‘हे’ कहलाता है। सर्वोत्तम फसल: बरसीम या रिज़का (लूशर्न)।
प्रश्न 5. पशु चिकित्सा में ‘कैथेटर’ (Catheter) नामक उपकरण का क्या उपयोग है?
उत्तर: यह एक पतली धातु या रबर की नली होती है, जिसका उपयोग बीमार पशु के यूरिनरी ब्लैडर (मूत्र मार्ग) में फंसा हुआ पेशाब कृत्रिम रूप से बाहर निकालने के लिए किया जाता है।
प्रश्न 6. पशुओं के खुरपका-मुँहपका (FMD) रोग के दो मुख्य लक्षण लिखिए।
उत्तर: 1) पशु के खुरों के बीच और मुँह के अंदर, मसूड़ों व जीभ पर छाले व घाव हो जाते हैं। 2) मुँह से लगातार अत्यधिक मात्रा में लार (Saliva) टपकती है और पशु लंगड़ाकर चलता है।
प्रश्न 7. गलघोटू रोग (Haemorrhagic Septicaemia) का कारण और टीका लगाने का समय बताइए।
उत्तर: यह रोग ‘पाश्चुरेला’ नामक जीवाणु के कारण होता है। इससे बचाव के लिए प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु शुरू होने से पहले (मई-जून के महीने में) एच.एस. (H.S.) का टीका लगाया जाता है।
प्रश्न 8. पशुओं का ‘लंगड़ी रोग’ (Black Quarter) क्या है?
उत्तर: यह मुख्य रूप से गौवंश और भैंसों का एक घातक जीवाणु जनित रोग है, जिसमें पशु के पुटठे और भारी मांसपेशियों (पुटी) में सूजन आ जाती है, पशु लंगड़ाने लगता है और सूजे हुए भाग को दबाने पर चरचराहट की आवाज़ (Crepitating Sound) आती है।
प्रश्न 9. थनैला रोग (Mastitis) के कारण दूध और थन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: थन सूजकर कड़े, लाल और गर्म हो जाते हैं। थनों से दूध निकलना बंद हो जाता है या दूध के स्थान पर पानी जैसा पतला, खून युक्त या छिछड़ेदार (Clots) बदबूदार द्रव निकलता है जिससे अयन (Udder) नष्ट हो जाता है।
प्रश्न 10. पशुओं की जांच में ‘गुणांकन पत्र’ (Score Card) विधि क्या है?
उत्तर: यह पशुओं के शारीरिक अंगों (बनावट, थन, अयन, सिर) को देखकर उनकी उपयोगिता जांचने की एक वैज्ञानिक विधि है। इसमें कुल 100 अंक निर्धारित होते हैं और अंगों के आधार पर अंक दिए जाते हैं।
प्रश्न 11. मछली पालन (मत्स्य व्यवसाय) के दो मुख्य लाभ लिखिए।
उत्तर: 1) यह कम लागत और कम भूमि में किसानों को उच्च आय और रोजगार प्रदान करता है। 2) समाज को प्रोटीन और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर पौष्टिक भोजन मिलता है।
प्रश्न 12. सूकर पालन (Pig Farming) व्यवसाय की दो मुख्य विशेषताएं लिखिए।
उत्तर: 1) सुअर अन्य पशुओं की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ते हैं और इनका फीड कन्वर्शन रेशियो (FCR) बहुत अधिक होता है। 2) मादा सुअर एक वर्ष में दो बार बच्चे दे सकती है और एक बार में 8-12 बच्चे पैदा करती है।
प्रश्न 13. जमुनापारी बकरी की दो मुख्य शारीरिक विशेषताएं लिखिए।
उत्तर: 1) इसका आकार भारतीय बकरियों में सबसे बड़ा होता है और इसका चेहरा तोते की तरह घुमावदार (तोतामुखी या Roman Nose) होता है। 2) इसके कान बहुत लंबे, चौड़े और नीचे लटके होते हैं तथा पीछे के पैरों पर लंबे बाल (Feathering) पाए जाते हैं।
प्रश्न 14. भारत में भेड़ पालन (Sheep Farming) की दो प्रमुख उपयोगिताएं लिखिए।
उत्तर: 1) ग्रामीण व मरुस्थलीय क्षेत्रों में ऊन (Wool) और मटन (मांस) का उत्पादन करना। 2) इनकी लेडी (खाद) से खेतों की जैविक उर्वरता बहुत बढ़ती है।
प्रश्न 15. मुर्गियों के ‘रानीखेत’ (Ranikhet Disease) रोग के दो लक्षण लिखिए।
उत्तर: 1) मुर्गियों को सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई होती है, वे मुँह खोलकर सीटी जैसी आवाज़ निकालती हैं। 2) मुर्गियाँ अपने पंख और पैर फैलाकर लकवाग्रस्त (Paralysis) हो जाती हैं और सफ़ेद-हरा पतला दस्त करती हैं।
प्रश्न 16. कुक्कुट (मुर्गी) पालन में ‘इन्क्यूबेटर’ उपकरण का महत्व बताइए।
उत्तर: इसके द्वारा एक साथ हजारों अंडों को कृत्रिम रूप से निश्चित तापमान (37.5°C) और आर्द्रता देकर मात्र 21 दिनों में एक समान चूजे निकाले जा सकते हैं, जिससे मुर्गी का समय बचता है।
प्रश्न 17. आनंद मॉडल या अमूल (AMUL) त्रिसदस्यीय संरचना क्या है?
उत्तर: यह सहकारिता का एक सफल तीन-स्तरीय ढांचा है: 1) ग्राम स्तर पर प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति। 2) जिला स्तर पर दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (डेयरी प्लांट)। 3) राज्य स्तर पर दुग्ध विपणन महासंघ।
प्रश्न 18. खीस (Colostrum) की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: ब्याने (प्रसव) के तुरंत बाद गाय या भैंस के थनों से निकलने वाला गाढ़ा, चिपचिपा, पीला और नमकीन द्रव खीस कहलाता है। यह नवजात बछड़े की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए अनिवार्य है।
प्रश्न 19. दूध और खीस में दो मुख्य अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 1) खीस गाढ़ा, पीला और अम्लीय होता है, जबकि दूध पतला, सफेद/हल्का पीला और कम अम्लीय होता है। 2) खीस को उबालने पर वह तुरंत थक्के के रूप में जम जाता है, जबकि सामान्य दूध उबालने पर नहीं फटता।
प्रश्न 20. दुग्ध अवशीतन (Milk Chilling) क्यों आवश्यक है?
उत्तर: दुग्ध दोहन के बाद यदि दूध को तुरंत ठंडा न किया जाए, तो उसमें उपस्थित जीवाणु तेजी से बढ़कर लैक्टिक अम्ल बनाते हैं जिससे दूध खट्टा होकर फट जाता है। जीवाणुओं की वृद्धि रोकने के लिए दूध को 4°C पर ठंडा करना आवश्यक है।
प्रश्न 21. दूध के ‘पाश्चुरीकरण’ (Pasteurization) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: दूध को एक निश्चित तापमान पर (जैसे 63°C पर 30 मिनट या 72°C पर 15 सेकंड) गर्म करके बिना उसके पोषक तत्व नष्ट किए, उसमें उपस्थित सभी रोगजनक हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने और तुरंत ठंडा करने की प्रक्रिया पाश्चुरीकरण कहलाती है।
प्रश्न 22. दूध का ‘मानकीकरण’ (Standardization) क्या है?
उत्तर: उपभोक्ता की मांग या सरकारी नियमों के अनुसार दूध में वसा (Fat) और वसा रहित ठोस (SNF) की प्रतिशत मात्रा को क्रीम मिलाकर या निकालकर एक निश्चित मानक स्तर पर लाने की क्रिया को मानकीकरण कहते हैं।
प्रश्न 23. पशु चिकित्सा में ‘बर्डीजो कास्ट्रेटर’ (Burdizzo Castrator) का क्या उपयोग है?
उत्तर: यह बिना कोई खून बहाए या चीरा लगाए, नर पशुओं की अंडकोष की नसों (Spermatic Cord) को दबाकर उन्हें स्थायी रूप से बधिया करने का एक आधुनिक और सुरक्षित वैज्ञानिक उपकरण है।
प्रश्न 24. मांस उत्पादक मुर्गियों को क्या कहा जाता है? इनके लिए सर्वोत्तम नस्ल का नाम लिखिए।
उत्तर: मांस उत्पादक मुर्गियों को ब्रॉयलर (Broilers) कहा जाता है। इनके लिए ‘प्लाइमाउथ रॉक’ या ‘कॉर्निश’ नस्लें सर्वोत्तम मानी जाती हैं।
प्रश्न 25. दुग्ध संगठन (Milk Composition) को प्रभावित करने वाले दो मुख्य कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर: 1) पशु की नस्ल या जाति (जैसे गाय और भैंस के दूध का अंतर)। 2) पशु का आहार और पोषण का स्तर।
प्रश्न 26. दूध का ‘अपेक्षित घनत्व’ ज्ञात करने का क्या उद्देश्य है?
उत्तर: दूध की शुद्धता की जांच करना, विशेष रूप से यह पता लगाना कि दूध में पानी की मिलावट की गई है या उसमें से क्रीम निकाली गई है (मलाई मारना)।
प्रश्न 27. डेयरी व्यवसाय में ‘सहकारिता’ (Cooperation) का क्या अर्थ है?
उत्तर: छोटे-छोटे ग्रामीण दुग्ध उत्पादक किसानों द्वारा बिचौलियों के शोषण से बचने के लिए स्वेच्छा से एक समूह या समिति बनाकर दूध का संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन करना ही दुग्ध सहकारिता कहलाता है।
प्रश्न 28. पशुओं के ‘गुणांकन पत्र’ में ‘अयन और थन’ (Udder) को कितने अंक दिए जाते हैं?
उत्तर: दुधारू पशुओं के गुणांकन पत्र में अयन और दुग्ध तंत्र की बनावट को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है, इसके लिए सामान्यतः 100 में से 30 से 35 अंक निर्धारित होते हैं।
प्रश्न 29. मुर्गी पालन में ‘लेयर्स’ (Layers) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: अंडा उत्पादन के उद्देश्य से पाली जाने वाली व्यावसायिक मुर्गियों को ‘लेयर्स’ कहा जाता है (जैसे व्हाइट लेगहॉर्न)।
प्रश्न 30. संतुलित पशु आहार (Balanced Ration) किसे कहते हैं?
उत्तर: वह आहार जिसमें पशु की सभी शारीरिक आवश्यकताओं, स्वास्थ्य रक्षा और दुग्ध उत्पादन के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व (प्रोटीन, वसा, खनिज, विटामिन) सही अनुपात और मात्रा में उपलब्ध हों।
भाग स: 3 अंक वाले लघु उत्तरीय प्रश्न (कुल: 15 प्रश्न)
प्रश्न 1. एक आदर्श साइलेज (Silage) के तीन प्रमुख गुण (विशेषताएं) लिखिए।
उत्तर: उत्तम और आदर्श साइलेज की तीन मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
1. रंग और गंध: इसका रंग हल्का पीला या गहरा हरा-भूरा होना चाहिए और इसमें से सिरके या पके हुए फल जैसी मीठी सुहावनी खुशबू (लैक्टिक अम्ल के कारण) आनी चाहिए।
2. स्वाद और अम्लता: इसका स्वाद हल्का खट्टा और सुपाच्य होना चाहिए। इसका पीएच (pH) मान 3.5 से 4.2 के बीच होना चाहिए जो इसकी अच्छी गुणवत्ता का प्रमाण है।
3. फफूंद रहित: साइलेज पूरी तरह से फफूंद (Mold) और सड़न से मुक्त होना चाहिए और उसमें पत्तियों का आकार स्पष्ट दिखना चाहिए, चिपचिपा नहीं होना चाहिए।
प्रश्न 2. पशु चिकित्सा में उपयोग होने वाले किन्हीं तीन महत्वपूर्ण उपकरणों के नाम और उनके कार्य लिखिए।
उत्तर: पशु चिकित्सा के तीन मुख्य उपकरण निम्नलिखित हैं:
1. ट्रोकार और कैनुला (Trocar and Cannula): इसका उपयोग पशुओं के पेट में होने वाले अत्यधिक अफरा या गैस (Bloat) को बाहर निकालने के लिए पेट की बाईं कोख में छेद करने के लिए किया जाता है।
2. ड्रेन्चिंग बॉटल (Drenching Bottle): यह एक लंबी गर्दन वाली बांस या कांच की बोतल होती है जिससे बीमार पशु को मुँह के रास्ते तरल दवाइयां बिना सांस नली में अटकाए पिलाई जाती हैं।
3. डिकॉर्निंग क्लिपर (Dehorner): छोटे बछड़ों में सींगों को बढ़ने से रोकने या सींग रोधन (Disbudding) के लिए सींग की कलिका को काटने या दबाने का उपकरण।
प्रश्न 3. पशुओं के खुरपका-मुँहपका (FMD) रोग से ग्रसित होने पर पशुपालक को कौन से तीन त्वरित उपचार करने चाहिए?
उत्तर: FMD रोग का कोई पक्का इलाज नहीं है, अतः निम्नलिखित सुधारात्मक उपचार करने चाहिए:
1. मुँह के घावों की सफाई: पशु के मुँह के छालों को दिन में दो-तीन बार 1% पोटेशियम परमैंगनेट (लाल दवा) या फिटकरी के हल्के घोल से धोना चाहिए।
2. खुरों के घावों का उपचार: पशु के पैरों को फिनाइल के पानी या नीले थोथे (कॉपर सल्फेट) के घोल से बने फुट-बाथ (Foot Bath) में खड़ा करना चाहिए और घावों पर एंटीसेप्टिक क्रीम लगानी चाहिए।
3. आहार में बदलाव: बीमार पशु को कड़ा सूखा चारा देने के बजाय सुपाच्य दलिया, मांड या मुलायम हरा चारा देना चाहिए ताकि मुँह में दर्द न हो।
प्रश्न 4. पशुओं के ‘गलघोटू रोग’ (Haemorrhagic Septicaemia) के तीन प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर: गलघोटू एक तीव्र और जानलेवा रोग है, इसके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:
1. गले में भारी सूजन: पशु के गले, निचले जबड़े और छाती के अग्र भाग पर एक कड़ी और दर्दनाक सूजन आ जाती है, जिससे पशु को सिर हिलाने में दर्द होता है।
2. सांस लेने में कठिनाई (घुरघुर की आवाज़): सूजन के कारण सांस नली दब जाती है। पशु मुँह खोलकर जीभ बाहर निकालकर सांस लेता है और गले से तेज घुरघुर (Snoring) की आवाज़ आती है।
3. तेज बुखार और लार: पशु का शरीर का तापमान 105°F से 107°F तक बढ़ जाता है, आँखें लाल हो जाती हैं और मुँह से लगातार गाढ़ी लार गिरती है। 24-48 घंटे में पशु की मृत्यु हो सकती है।
प्रश्न 5. पशुओं की जांच की ‘दांतों द्वारा आयु ज्ञात करने की विधि’ के तीन मुख्य नियम या सिद्धांत लिखिए।
उत्तर: दांतों द्वारा आयु का सटीक अनुमान निम्नलिखित सिद्धांतों पर लगाया जाता है:
1. अग्र कृन्तक दांत (Incisors): पशुओं के केवल निचले जबड़े में ही सामने के काटने वाले दांत (कृन्तक) पाए जाते हैं, ऊपरी जबड़े में दांत के स्थान पर कड़ा डेंटल पैड होता है। इन दांतों की संख्या 8 (4 जोड़ी) होती है।
2. अस्थायी और स्थायी दांतों का अंतर: बछड़े के जन्म के समय या कुछ हफ्तों में छोटे, सफेद कड़े अस्थायी (दूध के) दांत निकलते हैं। दो वर्ष की आयु के बाद ये दांत गिरते हैं और इनके स्थान पर बड़े, चौड़े स्थायी दांत निकलते हैं।
3. जोड़ों का निकलना: प्रत्येक वर्ष स्थायी दांतों का एक जोड़ा निकलता है। जैसे – 2 वर्ष में 1 जोड़ी, 3 वर्ष में 2 जोड़ी, 4 वर्ष में 3 जोड़ी और 5 वर्ष की आयु में पूरे 4 जोड़ी स्थायी दांत निकल आते हैं, जिसे ‘पूरा मुँह’ (Full Mouth) कहते हैं। इसके बाद दांतों के घिसने के आधार पर आयु मापी जाती है।
प्रश्न 6. सूकर पालन (Pig Farming) व्यवसाय शुरू करने के लिए कोई तीन मुख्य आर्थिक लाभों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: सूकर पालन के तीन आर्थिक लाभ इस प्रकार हैं:
1. अत्यधिक तीव्र शारीरिक वृद्धि: सुअर खाए गए भोजन को बहुत तेजी से मांस में बदलते हैं। मात्र 6-8 महीने में एक सुअर का बच्चा 70-90 किग्रा वजन प्राप्त कर लेता है, जिससे पूंजी जल्दी वापस मिलती है।
2. उच्च प्रजनन क्षमता: एक मादा सुअर एक बार में 8 से 12 बच्चे देती है और वर्ष में दो बार ब्या सकती है, जिससे बहुत कम समय में स्टॉक बड़ा हो जाता है।
3. कम लागत में आहार प्रबंधन: सुअर रसोई के बचे कचरे, होटलों के वेस्ट और कृषि सह-उत्पादों को आसानी से खाकर पचा सकते हैं, जिससे इनके दाने का खर्च काफी कम किया जा सकता है।
प्रश्न 7. भारतीय बकरियों की रानी ‘जमुनापारी’ (Jamunapari) नस्ल के तीन मुख्य गुण और उपयोगिता लिखिए।
उत्तर: जमुनापारी भारत की सबसे प्रसिद्ध द्विप्रयोजनी (Dual Purpose) नस्ल है:
1. दुग्ध उत्पादन क्षमता: यह बकरियों में सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल है, जो औसतन 2 से 3 लीटर दूध प्रतिदिन देती है। इसके दूध में वसा की मात्रा लगभग 5% होती है।
2. मांस उत्पादन: भारी और बड़े शरीर (वयस्क नर का वजन 50-60 किग्रा) के कारण यह मांस उत्पादन के लिए भी बहुत लाभदायक मानी जाती है।
3. कठिन परिस्थितियों के अनुकूल: यह नस्ल शुष्क और झाड़ीदार क्षेत्रों में दूर तक चरने की क्षमता रखती है और कम देखरेख में भी अच्छा प्रदर्शन करती है।
प्रश्न 8. मुर्गियों के ‘रानीखेत’ रोग से बचाव के लिए कौन सी तीन महत्वपूर्ण सावधानियां अपनानी चाहिए?
उत्तर: रानीखेत (New Castle Disease) एक लाइलाज विषाणु रोग है, अतः बचाव ही एकमात्र उपाय है:
1. समय पर टीकाकरण (Vaccination): चूजों के जन्म के पहले सप्ताह (5-7 दिन) में लासोटा (Lasota/F-1) का टीका आँख या नाक में देना चाहिए और 8-10 सप्ताह की आयु में आर-2बी (R₂B) का मुख्य टीका अवश्य लगाना चाहिए।
2. सख्त क्वारंटाइन (पृथक्करण): बीमार मुर्गियों को तुरंत स्वस्थ मुर्गियों के झुंड से अलग कर देना चाहिए ताकि वायरस न फैले। मृत मुर्गियों को खुले में फेंकने के बजाय जमीन में गहरा दफनाना या जला देना चाहिए।
3. फार्म की जैव-सुरक्षा: मुर्गी घर के फर्श पर चूने का छिड़काव करना चाहिए और बर्तनों को नियमित रूप से पोटेशियम परमैंगनेट के घोल से धोना चाहिए। बाहरी अनजान व्यक्तियों का प्रवेश फार्म में रोकना चाहिए।
प्रश्न 9. नवजात बछड़े को ‘खीस’ (Colostrum) पिलाना क्यों अनिवार्य माना जाता है? तीन मुख्य कारण दीजिए।
उत्तर: बछड़े के जन्म के पहले घंटे के भीतर खीस पिलाना निम्नलिखित कारणों से अनिवार्य है:
1. रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity): खीस में प्रचुर मात्रा में इम्यूनोग्लोबुलिन (एंटीबॉडीज) होते हैं, जो नवजात बछड़े को बाहरी घातक बीमारियों और इन्फेक्शन से लड़ने की प्राकृतिक शक्ति प्रदान करते हैं।
2. पेट की सफाई (Laxative Effect): खीस एक प्राकृतिक रेचक की तरह कार्य करता है, जो बछड़े के पेट के अंदर जमा पहले मल (मेकोनियम – Meconium) को आसानी से बाहर निकालकर पेट साफ कर देता है।
3. पोषक तत्वों का खजाना: इसमें सामान्य दूध की तुलना में कई गुना अधिक प्रोटीन (एल्ब्युमिन), खनिज (कैल्शियम) और विटामिन ए पाया जाता है जो बछड़े को तत्काल भारी ऊर्जा देता है।
प्रश्न 10. दुग्ध संगठन (Composition of Milk) को प्रभावित करने वाले किन्हीं तीन मुख्य कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: दूध के विभिन्न अवयवों (वसा, प्रोटीन, पानी) की मात्रा निम्नलिखित कारणों से बदलती है:
1. पशु की जाति या प्रजाति: अलग-अलग पशुओं के दूध का संगठन अलग होता है। उदाहरण के लिए, भैंस के दूध में वसा (Fat) की मात्रा (7-8%) गाय के दूध (4-5%) की तुलना में लगभग दोगुनी होती है।
2. ब्याने का समय या दुग्ध काल (Stage of Lactation): ब्याने के तुरंत बाद दूध में वसा कम होती है, लेकिन जैसे-जैसे दुग्ध काल आगे बढ़ता है और गाय दूध देना बंद करने वाली होती है, दूध की मात्रा कम हो जाती है परंतु वसा का प्रतिशत बढ़ जाता है।
3. दुहने की विधि और समय: शाम के दूध में सुबह के दूध की तुलना में वसा थोड़ी अधिक होती है। इसके अलावा, अयन से निकलने वाले शुरुआती दूध में वसा बहुत कम (1-2%) होती है, जबकि थन से निकलने वाले अंतिम दूध (Strippings) में वसा सबसे अधिक (8-10%) होती है।
प्रश्न 11. दुग्ध सहकारिता के क्षेत्र में ‘आनंद पद्धति’ या अमूल मॉडल के तीन मुख्य लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: अमूल मॉडल ने भारतीय ग्रामीण डेयरी व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया, इसके तीन लाभ निम्नलिखित हैं:
1. बिचौलियों का अंत: इसने गांवों से पारंपरिक दूधिया और दलालों के शोषण को समाप्त कर दिया। किसान सीधे अपनी सहकारी समिति को दूध बेचते हैं जिससे उन्हें दूध का पूरा और सही मूल्य मिलता है।
2. नियमित और पारदर्शी भुगतान: गांवों की समितियों में कंप्यूटर द्वारा दूध की मात्रा और वसा (Fat) की जांच तुरंत होती है और दूध की गुणवत्ता के आधार पर सप्ताह में या प्रतिदिन नकद भुगतान सीधे किसानों को मिलता है।
3. पशु चिकित्सा और कृत्रिम गर्भाधान सुविधाएं: सहकारी संघ किसानों को उनके घर पर ही बहुत कम कीमत पर संतुलित पशु आहार (पशु दाना), उत्तम बीज, कृत्रिम गर्भाधान और चौबीसों घंटे डॉक्टरों की आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं प्रदान करता है।
प्रश्न 12. दूध के ‘मानकीकरण’ (Standardization) और ‘समांगीकरण’ (Homogenization) में क्या अंतर है?
उत्तर: दोनों दुग्ध प्रसंस्करण की आधुनिक विधियाँ हैं जिनमें निम्नलिखित मुख्य अंतर है:
1. मानकीकरण: इसका संबंध दूध के रासायनिक संगठन से है। इसमें दूध के अंदर वसा (Fat) और एसएनएफ (SNF) की मात्रा को कानूनी मानकों के अनुसार क्रीम मिलाकर या स्कीमड मिल्क पाउडर मिलाकर निश्चित स्तर पर लाया जाता है।
2. समांगीकरण: इसका संबंध दूध के भौतिक स्वरूप से है। इसमें दूध को बहुत उच्च दाब पर बारीक छिद्रों से गुजारा जाता है ताकि वसा के बड़े कण टूटकर इतने छोटे हो जाएं कि वे दूध में एक समान तैरते रहें और दूध के ऊपर मलाई की अलग परत न जमे।
प्रश्न 13. थनैला रोग (Mastitis) से ग्रसित पशु की पहचान के लिए ‘स्ट्रिप कप टेस्ट’ (Strip Cup Test) की विधि को समझाइए।
उत्तर:स्ट्रिप कप टेस्ट की विधि: यह थनैला रोग की प्रारंभिक अवस्था को जांचने की एक बहुत ही सरल और प्रभावी ऑन-फार्म विधि है। इसके लिए एक विशेष कप का उपयोग किया जाता है जिसके ऊपर काले रंग का कपड़ा या बारीक जाली लगी होती है। दुग्ध दोहन शुरू करने से पहले प्रत्येक थन की शुरुआती दो-तीन धारों (दूध) को सीधे इस काले कपड़े या जाली पर मारा जाता है। यदि दूध जाली से छनकर नीचे चला जाता है और कपड़े पर कोई अवशेष नहीं बचता, तो थन स्वस्थ है। परंतु यदि कपड़े पर दूध के छिछड़े (Clots), गाढ़ा मवाद, फ्लेक्स या खून के धब्बे रुके हुए दिखाई देते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि पशु थनैला रोग से पीड़ित है।
प्रश्न 14. मत्स्य पालन व्यवसाय के अंतर्गत ‘प्रेरित प्रजनन’ (Induced Breeding/Hypophysation) तकनीक क्या है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर: प्राकृतिक रूप से कई व्यावसायिक मछलियाँ (जैसे रोहू, कतला) केवल बहती हुई नदियों में ही अंडे देती हैं, ठहरे हुए तालाब के पानी में वे प्रजनन नहीं करतीं। इस समस्या को दूर करने के लिए मछलियों को कृत्रिम रूप से मछली के सिर से निकाली गई ‘पिट्यूटरी ग्रंथि का अर्क’ (Pituitary Extract) या आधुनिक सिंथेटिक हार्मोन (जैसे ओवाप्रिम – Ovaprim) का इंजेक्शन लगाया जाता है। इस हार्मोन के प्रभाव से मछलियाँ तालाब के ठहरे हुए पानी में भी तय समय पर भारी मात्रा में उत्तम अंडों का त्याग कर देती हैं। इस वैज्ञानिक तकनीक को प्रेरित प्रजनन कहते हैं। इससे मत्स्य पालकों को उच्च गुणवत्ता वाले शुद्ध मछली के बच्चे (जीरा/Spawns) आसानी से मिल जाते हैं।
प्रश्न 15. पशु आहार के प्रमुख अवयवों (Nutrients) का वर्गीकरण रेखाचित्र या सूची द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पशु आहार को मुख्य रूप से दो बड़े भागों में विभाजित किया जाता है:
1. मोटा चारा (Roughage): इसमें रेशे अधिक होते हैं और पाचक तत्व कम। इसके दो भाग हैं: a) सूखा चारा: जैसे कड़बी, भूसा और पुआल। b) हरा रसीला चारा: जैसे बरसीम, जई, नैपियर घास, साइलेज और हे (Hay)।
2. दाना या सांद्रित आहार (Concentrates): इसमें रेशे की मात्रा 18% से कम होती है और पाचक तत्व (TDN) 60% से अधिक होते हैं। इसके अंतर्गत अनाज (मक्का, जौ), चोकर, विभिन्न खली (सरसों, मूंगफली की खली) और खनिज लवणों का मिश्रण आता है, जो मुख्य रूप से दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए दिया जाता है।
भाग द: 4 अंक वाले दीर्घ उत्तरीय व विश्लेषणात्मक प्रश्न (कुल: 10 प्रश्न)
प्रश्न 1. उत्तम साइलेज (Silage) बनाने की ‘गड्ढा विधि’ (Silo Pit Method) का चरणबद्ध तरीके से सविस्तार वर्णन कीजिए। साइलेज बनाने के क्या लाभ हैं?
उत्तर:1. साइलेज बनाने की गड्ढा विधि (Silo Pit Method):
यह हरे चारे को बिना सुखाए भविष्य के लिए सुरक्षित रखने की सबसे लोकप्रिय विधि है, जो निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है:
– गड्ढे (साइलो) का निर्माण: खेत में एक ऊंचे स्थान पर जहाँ पानी न भरता हो, 8-10 फीट गहरा और आवश्यकतानुसार चौड़ा एक पक्का ईंटों का गड्ढा बनाया जाता है।
– फसल का चयन और कटाई: मक्का, ज्वार या बाजरा जैसी फसलों को तब काटा जाता है जब उनके दानों में दूध भरा हो (Dough Stage), क्योंकि इस समय कार्बोहाइड्रेट अधिकतम होता है। फसल को चॉपर मशीन द्वारा 2-3 सेमी के छोटे टुकड़ों (कुट्टी) में काट लिया जाता है।
– गड्ढे को भरना और दबाना: कटी हुई कुट्टी को गड्ढे में 30-30 सेमी की परतों में भरा जाता है। प्रत्येक परत को ट्रैक्टर या बैलों द्वारा अच्छी तरह दबाया जाता है ताकि अंदर की पूरी हवा (ऑक्सीजन) बाहर निकल जाए। हवा निकालना सबसे महत्वपूर्ण है ताकि एनारोबिक किण्वन हो सके।
– सील करना: गड्ढे को जमीन की सतह से 2-3 फीट ऊपर तक भरकर उसके ऊपर सूखी घास की परत बिछाते हैं और फिर गीली मिट्टी और गोबर का लेप लगाकर पूरी तरह एयर-टाइट (सील) कर देते हैं। 8 से 12 सप्ताह (लगभग 3 महीने) में साइलेज बनकर तैयार हो जाता है।
2. साइलेज बनाने के प्रमुख लाभ:
1. हरे चारे की निरंतर उपलब्धता: गर्मियों और सूखे के दिनों में जब देश में हरे चारे की भारी कमी होती है, तब यह पशुओं को रसीला और पौष्टिक भोजन प्रदान करता है।
2. कम स्थान में भंडारण: हरे चारे को सुखाकर रखने की तुलना में साइलेज के रूप में बहुत कम स्थान में अधिक मात्रा में सुरक्षित रखा जा सकता है।
3. पोषक तत्वों की न्यूनतम हानि: इसमें चारे का विटामिन ए और अन्य पाचक तत्व पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं और यह बहुत सुपाच्य होता है जिससे पशुओं का दूध उत्पादन स्तर कम नहीं होता।
प्रश्न 2. पशुओं के ‘खुरपका-मुँहपका’ (FMD) और ‘पशु प्लेग’ (Rinderpest) रोगों का तुलनात्मक वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए:
(a) रोग का कारण (b) दो मुख्य लक्षण (c) फैलने का माध्यम (d) बचाव के उपाय।
उत्तर: FMD और पशु प्लेग दोनों ही पशुओं के सबसे खतरनाक और संक्रामक विषाणु जनित रोग हैं। दोनों की विस्तृत तुलनात्मक समीक्षा नीचे दी गई है:
| तुलना का शीर्षक | खुरपका-मुँहपका रोग (FMD) | पशु प्लेग (Rinderpest) | |||
|---|---|---|---|---|---|
| (a) रोग का कारण | यह ओ, ए, सी (O, A, C) और एशिया-1 नामक अति सूक्ष्म विषाणु (Virus) के कारण फैलता है। | यह पैरामिक्सोविपीडे परिवार के ‘पेस्टे डेस पेटिट्स’ विषाणु के कारण फैलता है (इसे पोकनी भी कहते हैं)। | |||
| (b) मुख्य लक्षण | पशु के मुँह, मसूड़ों और खुरों के बीच छाले व गहरे घाव हो जाते हैं। 2. मुँह से लार टपकती है और चप-चप की आवाज़ आती है, पशु लंगड़ाता है। | पशु को अत्यधिक तेज खूनी दस्त (Dysentery) होते हैं जिससे दुर्गंध आती है। 2. मुँह के अंदर की श्लेष्मिक झिल्ली में चोकर के दानों जैसे घाव बन जाते हैं। | (c) फैलने का माध्यम | यह दूषित चारे, पानी और हवा द्वारा बहुत तेजी से फैलता है। बीमार पशु के पैर के घाव से वायरस अन्य पशुओं तक पहुँचता है। | यह मुख्य रूप से बीमार पशु के मल-मूत्र, लार और दूषित पानी के सीधे संपर्क में आने से स्वस्थ पशुओं में फैलता है। |
| (d) बचाव के उपाय | स्वस्थ पशुओं को वर्ष में दो बार (मई और नवंबर) एफ.एम.डी. (FMD) का प्रिवेंटिव टीका अवश्य लगाना चाहिए। 2. बीमार पशु के पैरों को नीले थोथे के पानी से धोना चाहिए। | इससे बचाव के लिए जी.टी.वी. (GTV – Goat Tissue Vaccine) का टीका लगाया जाता है जिससे लंबे समय तक सुरक्षा मिलती है। 2. बीमार पशु की मृत्यु पर उसे चूना डालकर गाड़ना चाहिए। |
प्रश्न 3. पशुओं के किन्हीं दो प्रमुख संक्रामक रोगों – ‘गलघोटू’ (HS) और ‘लंगड़ी’ (BQ) के कारक जीवाणुओं के नाम लिखिए तथा दोनों रोगों के दो-दो विशिष्ट लक्षण एवं नियंत्रण के उपायों की सविस्तार व्याख्या कीजिए।
उत्तर: गलघोटू और लंगड़ी दोनों ही वर्षा ऋतु में फैलने वाले अत्यंत घातक और जानलेवा जीवाणु जनित रोग हैं।
1. गलघोटू रोग (Haemorrhagic Septicaemia):
– कारक जीवाणु: गायों में यह पाश्चुरेला बोविसेप्टिका (Pasteurella biseptica) और भैंसों में पाश्चुरेला बुबलीसेप्टिका नामक बैक्टीरिया द्वारा फैलता है।
– दो विशिष्ट लक्षण: 1) पशु के निचले जबड़े, गले और छाती के अगले हिस्से पर एक कड़ी, गर्म और बहुत दर्दनाक सूजन आ जाती है। 2) सूजन के कारण सांस नली दब जाती है जिससे पशु बहुत तेजी से हाँफने लगता है और गले से तेज ‘घुरघुर’ की आवाज़ आती है। पशु का बुखार 106°F तक पहुँच जाता है।
2. लंगड़ी रोग (Black Quarter):
– कारक जीवाणु: यह क्लॉस्ट्रिडियम शॉवियाई (Clostridium chauvoei) नामक अवायवीय बीजाणु बनाने वाले जीवाणु द्वारा फैलता है।
– दो विशिष्ट लक्षण: 1) पशु के पिछले पुट्ठे, कंधे या गर्दन की भारी मांसपेशियों में एक बड़ी सूजन आ जाती है जिससे पशु गंभीर रूप से लंगड़ाने लगता है। 2) सूजे हुए भाग को हाथ से दबाने पर उसके अंदर एकत्रित गैस के कारण ‘चरचराहट’ (Chuchura) की स्पष्ट आवाज़ आती है और काटने पर काला झागदार बदबूदार खून निकलता है।
नियंत्रण एवं बचाव के उपाय (दोनों के लिए सामूहिक):
1. टीकाकरण: प्रतिवर्ष मानसून शुरू होने से पहले (मई-जून में) दोनों रोगों के बचाव के लिए एच.एस. (H.S. Vaccine) और बी.क्यू. (B.Q. Vaccine) के टीके अनिवार्य रूप से लगवाने चाहिए।
2. एंटीबायोटिक्स का उपयोग: रोग की बिल्कुल शुरुआती अवस्था में यदि पेनिसिलिन, टेट्रासाइक्लिन या सल्फा दवाइयों के भारी डोज डॉक्टर की सलाह पर दिए जाएं, तो पशु की जान बचाई जा सकती है।
3. स्वच्छता: बीमार पशु को तुरंत अलग बाड़े में बांधना चाहिए और उसके थूक व मल-मूत्र को मिट्टी में दबा देना चाहिए।
प्रश्न 4. दुधारू गाय या भैंस की जांच करके उसकी शारीरिक बनावट के आधार पर ‘गुणांकन पत्र’ (Score Card) तैयार करने की वैज्ञानिक विधि का सविस्तार वर्णन कीजिए। इसके विभिन्न अंगों को अंकों का विभाजन कैसे किया जाता है?
उत्तर:पशु जांच की गुणांकन पत्र विधि (Score Card Method):
यह पशुओं को खरीदने, उनकी नस्ल की शुद्धता जांचने और दुग्ध प्रतियोगिता के लिए सर्वोत्तम पशु का चयन करने की सबसे प्रामाणिक वैज्ञानिक विधि है। इसके अंतर्गत पशु के पूरे शरीर को चार मुख्य भागों में बांटकर कुल 100 अंकों में से नंबर दिए जाते हैं। अंकों का विस्तृत विभाजन और वर्गीकरण निम्नलिखित है:
1. सामान्य स्वरूप (General Appearance) – 30 अंक:
इसके अंतर्गत पशु की नस्ल के मुख्य लक्षण, रंग, चमड़ी का ढीलापन व चमक, चाल, आँखें और स्वभाव की जांच की जाती है। एक आदर्श दुधारू पशु का स्वभाव शांत और आँखें चमकीली होनी चाहिए।
2. शारीरिक क्षमता (Dairy Conformation) – 20 अंक:
इसके अंतर्गत पशु के शरीर का आकार देखा जाता है। दुधारू गाय या भैंस का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा अर्थात ‘तिकोना या पच्ची के आकार का’ (Wedge shaped) होना चाहिए। उसकी पसलियाँ चौड़ी और खुली होनी चाहिए।
3. शारीरिक क्षमता व पाचन अंग (Body Capacity) – 15 अंक:
इसमें पशु का पेट (रूमेन) बड़ा और छाती चौड़ी होनी चाहिए, जो इस बात का प्रमाण है कि पशु अधिक मात्रा में चारा खाकर पचा सकता है।
4. दुग्ध ग्रंथि तंत्र और अयन (Mammary System / Udder) – 35 अंक:
यह दुधारू पशु के लिए सबसे महत्वपूर्ण भाग है इसलिए इसे सर्वाधिक अंक दिए गए हैं। इसके अंतर्गत अयन (Udder) का आकार बड़ा, पीछे की ओर फैला हुआ और दुहने के बाद पूरी तरह सिकुड़ने वाला होना चाहिए। थन समान लंबाई के, अलग-अलग और बराबर दूरी पर होने चाहिए। पेट के नीचे की दुग्ध शिराएं (Milk Veins) लंबी, टेढ़ी-मेढ़ी और उभरी हुई होनी चाहिए।
श्रेणी का निर्धारण (Result):
– जिस पशु को 75 से 100 अंक मिलते हैं, उसे ‘सर्वोत्तम या ए-श्रेणी’ का पशु माना जाता है।
– 60 से 74 अंक पाने वाले पशु को ‘मध्यम या उत्तम’ और 60 से कम अंक पाने वाले को ‘साधारण’ माना जाता है।
भाग स: 3 अंक वाले लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रश्न 11 से 15 – शेष भाग)
प्रमुख विधि: कम समय उच्च ताप विधि (HTST – High Temperature Short Time Method), जिसमें दूध को 71.7°C पर 15 सेकंड के लिए गर्म किया जाता है और फिर तुरंत 4°C तक ठंडा किया जाता है।
1. इसके द्वारा डेयरी फार्म के लिए सर्वोत्तम दूध देने वाले या नस्ल सुधार के लिए उत्तम सांडों का चयन करना आसान हो जाता है।
2. पशु प्रदर्शनियों और मेलों में पशुओं की सही कीमत तय करने और उन्हें पुरस्कार देने के लिए यह एक निष्पक्ष आधार प्रदान करता है।
3. इसके माध्यम से पशुपालक को पशु के शारीरिक दोषों (जैसे पैर या थन की विकृति) की सटीक जानकारी समय पर मिल जाती है।
1. जल की उत्तम गुणवत्ता: तालाब में पानी का पीएच (pH) मान 7 से 8 के बीच होना चाहिए और उसमें पर्याप्त ऑक्सीजन घुली होनी चाहिए।
2. तालाब की तैयारी और चूने का प्रयोग: नए बीज डालने से पहले जंगली मछलियों और कीड़ों को मारना चाहिए और पानी को कीटाणुरहित व अम्लता दूर करने के लिए चूने (Lime) का छिड़काव करना चाहिए।
3. प्राकृतिक भोजन (प्लवक) की वृद्धि: पानी में कवक और फाइटोप्लांकटन की वृद्धि के लिए गोबर की खाद और सुपर फास्फेट का सही मात्रा में उपयोग करना चाहिए।
1. कम प्रारंभिक लागत: गाय या भैंस की तुलना में बकरी को खरीदने और उसके रहने व चारे की व्यवस्था करने का खर्च बहुत कम होता है।
2. कठिन परिस्थितियों में जीवन: बकरियां मरुस्थलीय, पहाड़ी और कम चारे वाले सूखे क्षेत्रों में भी विभिन्न प्रकार की झाड़ियाँ खाकर आसानी से जीवित रह सकती हैं।
3. तरल नकद (Liquid Asset): गरीब किसान या मजदूर जरूरत पड़ने पर बकरी को स्थानीय बाजार में बहुत आसानी और जल्दी से बेचकर नकद पैसा प्राप्त कर सकता है।
2. समांगीकरण: दूध पर उच्च दबाव डालकर उसमें उपस्थित वसा के बड़े कणों (Fat Globules) को बहुत महीन कणों में तोड़ना, ताकि दूध को रखने पर उसके ऊपर मलाई की परत अलग से न जमे और पूरा दूध एक समान गाढ़ा दिखाई दे।
भाग द: 4 अंक वाले दीर्घ उत्तरीय व विश्लेषणात्मक प्रश्न (कुल: 10 प्रश्न)
1. कार्बोहाइड्रेट: यह पशु आहार का सबसे बड़ा हिस्सा होता है जो भूसे और चारे से मिलता है। इसका मुख्य कार्य पशु के शरीर को दैनिक कार्यों, चलने-फिरने और जुगाली करने के लिए आवश्यक ऊर्जा (Energy) प्रदान करना है। यह शरीर के तापमान को भी बनाए रखता है।
2. प्रोटीन: यह खली (जैसे सरसों या कपास की खली) और दलहनी चारों से प्राप्त होता है। यह पशु के शरीर में नई कोशिकाओं और ऊतकों के निर्माण, मांसपेशियों के विकास और दूध में प्रोटीन (केसीन) के निर्माण के लिए अनिवार्य है।
3. खनिज लवण (Minerals): इसमें मुख्य रूप से कैल्शियम, फास्फोरस और नमक शामिल हैं। ये पशु की हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाते हैं। इनकी कमी से पशुओं में बांझपन या दूध का बुखार (Milk Fever) जैसी बीमारियां हो जाती हैं।
4. पानी: जल पशु शरीर का लगभग 60-70% भाग बनाता है। यह भोजन के पाचन, पोषक तत्वों के परिवहन, और मूत्र व पसीने के माध्यम से शरीर के हानिकारक जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने तथा शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
साइलेज बनाने की विधि (Ensilage): इसके लिए मक्का, ज्वार या बाजरे जैसे मोटे तने वाले चारों को फूल आने की अवस्था में काटा जाता है क्योंकि इस समय इनमें कार्बोहाइड्रेट अधिक होता है। खेत में एक गहरा गड्ढा (Silo Pit) खोदा जाता है। चारे को छोटे टुकड़ों (कुट्टी) में काटकर गड्ढे में परतों में अच्छी तरह दबा-दबाकर भरा जाता है ताकि अंदर की हवा बाहर निकल जाए। गड्ढा पूरा भरने के बाद ऊपर से पुआल, मिट्टी और गोबर का लेप लगाकर पूरी तरह सील कर दिया जाता है। 2 से 3 महीने में साइलेज बनकर तैयार हो जाता है।
उत्तम साइलेज के चार गुण:
1. इसका रंग गहरा हरा या हल्का पीला-सुनहरा होना चाहिए।
2. इसमें से सिरके जैसी सुखद और खट्टी महक (अम्लीय गंध) आनी चाहिए, दुर्गंध बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।
3. इसका पीएच (pH) मान 3.5 से 4.2 के बीच होना चाहिए (जो अच्छी अम्लता दर्शाता है)।
4. यह पूरी तरह फफूंद रहित और रसीला होना चाहिए जिसे पशु चाव से खाएं।
(a) रोग का कारक (b) चार मुख्य लक्षण (c) दो उपचार/दवाइयाँ (d) रोकथाम के दो उपाय।
(a) रोग का कारक: यह रोग एक अति सूक्ष्म विषाणु (Virus – ओ, ए, सी, एशिया-1) के कारण होता है।
(b) चार मुख्य लक्षण:
1. पशु को बहुत तेज बुखार आता है और वह सुस्त होकर खाना-पीना व जुगाली करना बंद कर देता है।
2. पशु के मुँह के अंदर, मसूड़ों और जीभ पर छोटे-छोटे छाले पड़ जाते हैं, जो बाद में फूटकर घाव बन जाते हैं।
3. मुँह से लगातार गाढ़ी और लसदार लार टपकती रहती है, और पशु चप-चप की आवाज करता है।
4. पशु के खुरों (पैरों) के बीच में छाले और घाव हो जाते हैं जिसके कारण पशु लंगड़ाकर चलने लगता है और घावों में कीड़े (Maggots) पड़ जाते हैं।
(c) दो उपचार/दवाइयाँ:
1. मुँह के घावों को साफ करने के लिए 1% पोटेशियम परमैंगनेट (लाल दवा) के घोल या सुहागे और शहद के मिश्रण का उपयोग करना चाहिए।
2. पैरों के घावों को फिनाइल के पानी या नीले थोथे (कॉपर सल्फेट) के 1% घोल से धोकर एंटीसेप्टिक क्रीम लगानी चाहिए।
(d) रोकथाम के उपाय: 1) बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से तुरंत अलग कर देना चाहिए। 2) वर्ष में दो बार (मानसून से पहले और बाद में) एफएमडी (FMD) का नि:शुल्क टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
प्रश्न 4. पशुओं के ‘गलघोटू’ (Haemorrhagic Septicaemia) रोग के कारण, लक्षण, उपचार तथा बचाव के वैधानिक उपायों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर: गलघोटू मुख्य रूप से गाय और भैंसों का वर्षा ऋतु में फैलने वाला एक अत्यंत घातक और जानलेवा रोग है।
रोग का कारण: यह रोग पास्चरेला मल्टोसीडा (Pasteurella multocida) नामक जीवाणु (Bacteria) के कारण होता है।
प्रमुख लक्षण:
1. पशु के गले और निचले जबड़े के पास बहुत बड़ी और गर्म सूजन आ जाती है जिसमें बहुत दर्द होता है।
2. सूजन के कारण सांस की नली दब जाती है जिससे पशु को सांस लेने में भारी कठिनाई होती है और वह घर-घर की तेज़ आवाज करता है।
3. पशु की जीभ बाहर निकल आती है, मुँह से लार बहती है और आँखें लाल हो जाती हैं। बुखार 105°F से ऊपर पहुँच जाता है।
4. दम घुटने के कारण प्रायः 24 से 48 घंटे के भीतर पशु की मृत्यु हो जाती है।
उपचार: रोग की शुरुआती अवस्था में ही पशु चिकित्सक से एंटीबायोटिक इंजेक्शन (जैसे सल्फाडिमिडिन या टेट्रासाइक्लिन) और सूजन कम करने की दवाइयाँ दिलवानी चाहिए।
बचाव के उपाय: वर्षा ऋतु शुरू होने से पहले मई-जून के महीने में एच.एस. (H.S. Vaccine) का रक्षात्मक टीका अनिवार्य रूप से लगवाना चाहिए। बीमार पशु के आवास को चूने से कीटाणुरहित करना चाहिए।
प्रश्न 5. डेयरी फार्म में उपयोग में आने वाले किन्हीं चार प्रमुख उपकरणों (जैसे – थर्मामीटर, ट्रोकार कैनुला, डॉकिंग मशीन, बर्डिजो कास्ट्रेटर) की पहचान और उनके विशिष्ट उपयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: पशु चिकित्सा और डेयरी प्रबंधन में काम आने वाले चार प्रमुख उपकरण निम्नलिखित हैं:
1. पशु थर्मामीटर (Clinical Thermometer): यह सामान्य थर्मामीटर से थोड़ा लंबा होता है। इसका उपयोग पशु के मलाशय (Rectum) में डालकर उसके शरीर का सटीक तापमान (बुखार) मापने के लिए किया जाता है ताकि बीमारी का पता चल सके।
2. ट्रोकार कैनुला (Trocar and Cannula): यह एक नुकीला सूजा और खोखली नली वाला उपकरण है। जब पशु के पेट में अत्यधिक गैस भर जाती है और वह ‘अफरा’ (Tympany) रोग से पीड़ित होकर मरने की स्थिति में होता है, तब इसके द्वारा पशु के पेट (बाईं कोख) में सीधे छेद करके फंसी हुई हानिकारक गैस को बाहर निकाला जाता है।
3. बर्डिजो कास्ट्रेटर (Burdizzo Castrator): यह एक बड़ा चिमटे जैसा स्टील का उपकरण है। इसका उपयोग सांड के बछड़ों की अंडवाहिनी नस को बिना कोई घाव या खून बहाए दबाकर नष्ट करने (बंध्याकरण या Castration) के लिए किया जाता है, ताकि उन्हें आज्ञाकारी बैल बनाया जा सके।
4. डॉकिंग मशीन (Docking Machine): यह मुख्य रूप से भेड़ पालन में काम आती है। इसका उपयोग मेमनों की पूँछ को साफ-सफाई और ऊन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए एक निश्चित उम्र में काटने (Tail Docking) के लिए किया जाता है।
प्रश्न 6. मुर्गी पालन (Poultry Farming) के अंतर्गत अंडा उत्पादक (Egg Layers) और मांस उत्पादक (Broilers) मुर्गियों की नस्लों का तुलनात्मक वर्णन कीजिए। किन्हीं चार प्रसिद्ध नस्लों के नाम व उपयोग लिखिए।
उत्तर: कुक्कुट पालन को उनके व्यावसायिक उपयोग के आधार पर मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है:
1. लेयर्स (Layers): ये मुर्गियां मुख्य रूप से व्यावसायिक स्तर पर अत्यधिक मात्रा में अंडे प्राप्त करने के लिए पाली जाती हैं। इनका शरीर हल्का, फुर्तीला और छोटा होता है और ये कम दाना खाकर अधिक अंडे देती हैं।
2. ब्रॉयलर्स (Broilers): ये मुर्गियां केवल मांस उत्पादन के लिए पाली जाती हैं। इनकी वृद्धि बहुत तेज होती है, ये मात्र 6 से 8 सप्ताह में पर्याप्त वजन (1.5 से 2 किग्रा) प्राप्त कर लेती हैं। इनका शरीर भारी और गद्देदार होता है।
चार प्रमुख नस्लें और उनकी उपयोगिता:
1. व्हाइट लेगहॉर्न (White Leghorn): यह विश्व की सबसे लोकप्रिय और सर्वश्रेष्ठ अंडा उत्पादक नस्ल है, जो वर्ष में औसतन 280 से 300 सफेद अंडे देती है।
2. कड़कनाथ (Karaknath): यह भारत की एक प्रसिद्ध स्वदेशी (मध्य प्रदेश की) नस्ल है। इसका पूरा शरीर, मांस और यहाँ तक कि खून भी काला होता है। इसके मांस में औषधीय गुण और उच्च प्रोटीन होने के कारण इसकी मांग बहुत अधिक है।
3. रोड आइलैंड रेड (RIR): यह एक ‘द्वि-प्रयोजनी’ (Dual Purpose) नस्ल है, जो अंडे और मांस दोनों के लिए समान रूप से उत्तम मानी जाती है।
4. प्लाईमाउथ रॉक (Plymouth Rock): यह एक विदेशी भारी नस्ल है जिसका उपयोग मुख्य रूप से उत्तम किस्म के ब्रॉयलर्स (मांस उत्पादक) तैयार करने के लिए क्रॉस ब्रीडिंग में किया जाता है।
प्रश्न 7. भारत में ‘साँछी/अमूल’ मॉडल के विशेष संदर्भ में दुग्ध सहकारिता (Dairy Cooperation) के तीन स्तरीय ढांचे (आनंद पैटर्न) की सविस्तार व्याख्या कीजिए।
उत्तर: भारत में ‘श्वेत क्रांति’ (Operation Flood) की सफलता का मुख्य श्रेय अमूल (AMUL) और मध्य प्रदेश के ‘सांची’ द्वारा अपनाए गए तीन स्तरीय दुग्ध सहकारी ढांचे को जाता है। यह ढांचा निम्नलिखित तीन स्तरों पर कार्य करता है:
1. ग्राम स्तर – प्राथमिक दुग्ध सहकारी समिति (DCS): यह सबसे बुनियादी स्तर है जहाँ गाँव के सभी पशुपालक इकट्ठा होकर अपनी समिति बनाते हैं। प्रत्येक गाँव का किसान सुबह-शाम अपना दूध इस समिति के केंद्र पर लाता है, जहाँ दूध की मात्रा और वसा (Fat) की जांच करके कंप्यूटर द्वारा तुरंत पारदर्शी भुगतान किया जाता है। यह गांवों से दूध एकत्र करने की मुख्य कड़ी है।
2. जिला स्तर – जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ (Union): जिले की सभी ग्राम समितियां इस जिला संघ की सदस्य होती हैं। जिला संघ गांवों से एकत्र किए गए दूध को बड़ी गाड़ियों (टैंकरों) द्वारा जिला डेयरी प्लांट तक लाता है, जहाँ दूध का पाश्चुरीकरण, पैकेजिंग और अन्य उत्पाद (घी, पेड़ा, मक्खन) बनाए जाते हैं। यह किसानों को पशु चिकित्सा, चारा और कृत्रिम गर्भाधान की सुविधाएं भी देता है।
3. राज्य स्तर – राज्य सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ (Federation): यह राज्य स्तर की सर्वोच्च संस्था है (जैसे गुजरात में GCMMF और म.प्र. में MPCDF)। इसका मुख्य कार्य पूरे राज्य में दूध और दुग्ध उत्पादों के ब्रांड (जैसे सांची या अमूल) का प्रचार करना, बड़े शहरों में बिक्री का नेटवर्क संभालना और नीतिगत निर्णय लेना है ताकि बिचौलियों का अंत हो और लाभ सीधे किसान को मिले।
प्रश्न 8. दूध (Milk) और खीस (Colostrum) की परिभाषा दीजिए। दोनों के रासायनिक संगठन, गुणों और नवजात बछड़ों के लिए खीस के महत्व की विस्तृत तुलना कीजिए।
उत्तर:परिभाषाएं: पशु के ब्याने के तुरंत बाद थनों से निकलने वाले गाढ़े, पीले और चिपचिपे स्राव को खीस (Colostrum) कहते हैं। ब्याने के 4-5 दिन बाद जब यह स्राव सामान्य हो जाता है, तो उसे दूध कहते हैं।
दूध और खीस में मुख्य तुलनात्मक अंतर:
1. रासायनिक संगठन: खीस में दूध की तुलना में लगभग 4 से 5 गुना अधिक प्रोटीन (विशेषकर एल्बुमिन और ग्लोब्युलिन) पाया जाता है। इसमें विटामिन ए, लोहा और खनिज तत्व भी दूध से कई गुना अधिक होते हैं, जबकि पानी की मात्रा कम होती है।
2. भौतिक गुण: खीस गाढ़ा, हल्के अम्लीय स्वाद वाला और पीले रंग का होता है, जिसे गर्म करने पर वह तुरंत फट जाता है (स्कंदित हो जाता है)। दूध सफेद या हल्का पीला, मीठा और द्रव रूप में होता है जो उबालने पर फटता नहीं है।
नवजात बछड़ों के लिए खीस का महत्व:
1. रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity): खीस में प्रचुर मात्रा में एंटीबॉडीज (इम्यूनोग्लोब्युलिन) होते हैं, जो नवजात बछड़े को बाहरी कीटाणुओं और बीमारियों से लड़ने की प्राकृतिक शक्ति प्रदान करते हैं।
2. रेचक गुण (Laxative Effect): खीस बछड़े के पेट के लिए एक प्राकृतिक दस्तावर का काम करती है, जिससे बछड़े के पेट में जन्म से जमा काला मल (Meconium) आसानी से बाहर निकल जाता है और उसका पाचन तंत्र साफ हो जाता है।
प्रश्न 9. डेयरी फार्म में दुग्ध संग्रहण के अंतर्गत ‘दुग्ध अवशीतन’ (Milk Cooling/Chilling) क्या है? इसके उद्देश्य, विधियों और डेयरी उद्योग में इसके महत्व पर एक विस्तृत लेख लिखिए।
उत्तर:दुग्ध अवशीतन (Chilling): थनों से निकालते समय दूध का तापमान लगभग 37°C होता है। इस तापमान पर दूध में उपस्थित बैक्टीरिया बहुत तेजी से बढ़ते हैं और 2-3 घंटे में दूध को खट्टा करके फाड़ देते हैं। दूध को फटने से बचाने के लिए उसके तापमान को तुरंत 4°C या उससे नीचे तक ठंडा करने की प्रक्रिया को दुग्ध अवशीतन कहते हैं।
मुख्य उद्देश्य व महत्व: इसका उद्देश्य दूध में उपस्थित बैक्टीरिया की वृद्धि को पूरी तरह धीमा या निष्क्रिय करना है, ताकि दूध को गांवों से दूर स्थित बड़े शहरों के प्रोसेसिंग प्लांट तक बिना खराब हुए सुरक्षित पहुँचाया जा सके।
अवशीतन की प्रमुख विधियाँ:
1. बल्क मिल्क कूलर (BMC): गांवों के दुग्ध संग्रह केंद्रों पर बड़े स्टेनलेस स्टील के टैंक लगे होते हैं, जिनमें प्रशीतन प्रणाली (Refrigeration) द्वारा दूध को सीधे 4°C पर ठंडा करके स्टोर किया जाता है।
2. सतही अवशीतक (Surface Chiller): इसमें ठंडे पानी या बर्फ की गैस वाली नलियों की एक प्लेट होती है, जिसके ऊपर से दूध को पतली परत में बहाया जाता है, जिससे दूध तुरंत ठंडा हो जाता है। यह डेयरी उद्योग में दूध की बर्बादी रोकने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
प्रश्न 10. भेड़ पालन (Sheep Farming) और सूकर पालन (Pig Farming) का भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में क्या योगदान है? इनकी दो-दो प्रमुख नस्लों के नाम और उनकी व्यावसायिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर: भेड़ और सूकर पालन छोटे व सीमांत किसानों की आय बढ़ाने वाले दो प्रमुख सहायक कृषि व्यवसाय हैं।
1. भेड़ पालन का योगदान और नस्लें: भेड़ पालन से ग्रामीण क्षेत्रों में ऊन (Wool), मांस, और चमड़ा प्राप्त होता है। इसकी सूखी खाद खेतों को उपजाऊ बनाती है।
– मेरिनो (Merino): यह मूल रूप से स्पेन की नस्ल है। यह विश्व में सबसे उच्च गुणवत्ता वाली, अत्यंत महीन और नर्म ऊन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
– मारवाड़ी (Marwari): यह भारत की (राजस्थान व गुजरात की) एक मजबूत नस्ल है। इसका रोग प्रतिरोधक तंत्र बहुत मजबूत होता है और इसकी ऊन का उपयोग मोटे कालीन और कंबल बनाने में किया जाता है।
2. सूकर पालन का योगदान और नस्लें: सूकर पालन सबसे कम समय और कम चारे की लागत में अत्यधिक मांस (Pork) उत्पादन देने वाला व्यवसाय है। सूकर की प्रजनन क्षमता बहुत अधिक होती है।
– लार्ज व्हाइट यॉर्कशायर (Large White Yorkshire): यह विश्व की सबसे लोकप्रिय सफेद रंग की विदेशी नस्ल है। इसका शरीर बहुत बड़ा होता है और यह व्यावसायिक मांस उत्पादन के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
– लैंडरेस (Landrace): यह भी एक उन्नत विदेशी नस्ल है जिसका शरीर लंबा और कान झुके होते हैं। यह कम वसा वाले उत्तम गुणवत्ता के मांस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।







