
MP BOARD की आगामी अर्द्धवार्षिक/ वार्षिक परीक्षा 2026-27 के लिए कक्षा 12 फसल उत्पादन (Crop Production) नोट्स/ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर 2026-27 (MP Board) दिए गए हैं हिंदी के अतिरिक्त इंग्लिश , संस्कृत , भौतिक , रसायन (विज्ञान/ गणित संकाय ) कला संकाय ( इतिहास , राजनीति आदि ) कामर्स संकाय ( एकाउंटेंसी , व्यवसाय अध्ययन ) कृषि संकाय के नोट्स/ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर इस वेबसाईट पर दिए गए है . बोर्ड परीक्षा तक वेबसाईट को दिन में कम से कम एक बार अवश्य चेक करें . नियमित अपडेट होगी .
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अर्द्धवार्षिक/ वार्षिक परीक्षा 2026-27 कक्षा 12 फसल उत्पादन (Crop Production) नोट्स/ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (MP Board)
भाग अ: 1 अंक वाले वस्तुनिष्ठ प्रश्न (कुल: 50 प्रश्न)
1. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
2. रिक्त स्थानों की पूर्ति (Fill in the Blanks)
3. सत्य या असत्य (True or False)
उत्तर: असत्य (यह चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नष्ट करने वाला खरपतवारनाशी/Herbicide है)
प्रश्न 25. सोयाबीन एक प्रमुख तिलहन और दलहन फसल है जो खरीफ ऋतु में उगाई जाती है। (सत्य/असत्य)
उत्तर: सत्य
प्रश्न 26. सभी प्रकार के जंगली मशरूम खाने योग्य और स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। (सत्य/असत्य)
उत्तर: असत्य (कई जंगली मशरूम अत्यंत जहरीले होते हैं जिन्हें ‘टोडस्टूल’ कहते हैं)
प्रश्न 27. मुगल गार्डन (जैसे दिल्ली का राष्ट्रपति भवन उद्यान) औपचारिक शैली (Formal Style) का उदाहरण है। (सत्य/असत्य)
उत्तर: सत्य
प्रश्न 28. अंगूर की बेलों में व्यावसायिक प्रवर्धन ‘कठोर लकड़ी की कलम’ (Hardwood Cutting) द्वारा किया जाता है। (सत्य/असत्य)
उत्तर: सत्य
प्रश्न 29. अश्वगंधा की सूखी जड़ों का उपयोग केवल कपड़ा रंगने के काम में आता है। (सत्य/असत्य)
उत्तर: असत्य (इसकी जड़ों का उपयोग आयुर्वेदिक औषधियां और ताकत बढ़ाने वाली दवाइयां बनाने में होता है)
प्रश्न 30. टमाटर और बैंगन दोनों ही सोलेनेसी (Solanaceae) वानस्पतिक कुल की सब्जियां हैं। (सत्य/असत्य)
उत्तर: सत्य
4. सही जोड़ी बनाइए (Match the Following)
प्रश्न 31 से 40. कॉलम अ की कृषि एवं उद्यानिकी मदों का कॉलम ब के सही वैज्ञानिक/व्यावसायिक विवरण से मिलान करें:
| कॉलम अ | कॉलम ब (सही उत्तर) |
|---|---|
| टाइल ड्रेनेज (Tile Drainage) | भूमिगत जल निकास की सर्वोत्तम विधि |
| खैरा रोग (Khaira Disease) | धान की फसल में जस्ते (Zinc) की कमी से होने वाला रोग |
| कम्पोस्ट की बेंगलोर विधि | अवायवीय (Anaerobic) विधि – एल. एन. आचार्य द्वारा विकसित |
| अमरबेल (Cuscuta) | एक पूर्ण तना परजीवी खरपतवार (Parasitic Weed) |
| धान की नर्सरी (Sowing) | डेपोग (Depog) विधि द्वारा कम समय में तैयार करना |
| बटन मशरूम | एगैरिकस बिस्पोरस (Agaricus bisporus) |
| गूटी बांधना (Air Layering) | नींबू और लीची में पौध प्रवर्धन की एक विधि |
| ईसबगोल का वैज्ञानिक नाम | प्लांटैगो ओवेटा (Plantago ovata) |
| खस घास (Vetiver) | इसकी जड़ों से सुगंधित तेल और कूलर की टट्टियां बनती हैं |
| पूसा रश्मी और पूसा चेतकी | मूली (Radish) की उन्नत और लोकप्रिय किस्में |
5. एक शब्द / एक वाक्य में उत्तर
प्रश्न 41. जल निकास गुणांक (Drainage Coefficient) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: किसी खेत या कमान क्षेत्र से 24 घंटे के भीतर प्रति इकाई क्षेत्रफल से बाहर निकाले जाने वाले पानी की कुल मात्रा।
प्रश्न 42. पौधों में ‘अग्रस्थ कलिका की मृत्यु’ (Dieback) किस सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी का मुख्य लक्षण है?
उत्तर: बोरान (B) या कैल्शियम की कमी।
प्रश्न 43. उस रासायनिक खाद का नाम बताइए जो पूरी तरह से फास्फोरस पोषक तत्व की पूर्ति के लिए उपयोग की जाती है।
उत्तर: सिंगल सुपर फास्फेट (SSP) या ट्रिपल सुपर फास्फेट।
प्रश्न 44. खरीफ ऋतु के किन्हीं दो प्रमुख खरपतवारों के नाम लिखिए।
उत्तर: मोथा (Cyperus rotundus) और सावां (Echinochloa)।
प्रश्न 45. गन्ने की फसल का वानस्पतिक नाम (Botanical Name) क्या है?
उत्तर: सैकेरम ऑफिसिनेरम (Saccharum officinarum)।
प्रश्न 46. व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली जहरीली मशरूम को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर: टोडस्टूल (Toadstool)।
प्रश्न 47. उद्यानों (Gardens) की वह कौन सी शैली है जिसमें प्रकृति की नकल की जाती है और कोई निश्चित नियम नहीं होते?
उत्तर: अनौपचारिक या प्राकृतिक शैली (Informal Style जैसे जापानी गार्डन)।
प्रश्न 48. केले के पौधों का प्रवर्धन मुख्य रूप से तने के किस भाग द्वारा किया जाता है?
उत्तर: तलवार सकर (Sword Suckers) या प्रकंद (Rhizome) द्वारा।
प्रश्न 49. ‘अश्वगंधा’ का वानस्पतिक नाम क्या है?
उत्तर: विथानिया सोम्नीफेरा (Withania somnifera)।
प्रश्न 50. दलहनी फसलों में चने की फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से कौन सी क्रिया की जाती है जिसमें ऊपरी कलिका तोड़ते हैं?
उत्तर: शीर्ष कर्तन या निप्पिंग (Nipping) की क्रिया।
भाग ब: 2 अंक वाले लघु उत्तरीय प्रश्न (कुल: 30 प्रश्न)
प्रश्न 1. जल निकास (Drainage) की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: फसलों की सामान्य वृद्धि और भूमि की दशा में सुधार करने के लिए खेत की सतह या उप-सतह से अनावश्यक और अतिरिक्त जल को कृत्रिम नालियों या अन्य माध्यमों से बाहर निकालने की क्रिया को जल निकास कहते हैं।
प्रश्न 2. सिंचाई और जल निकास में दो मुख्य अंतर लिखिए।
उत्तर: 1) सिंचाई में फसल की आवश्यकतानुसार खेत में कृत्रिम रूप से पानी दिया (Inflow) जाता है। जल निकास में अतिरिक्त पानी को खेत से बाहर निकाला (Outflow) जाता है। 2) सिंचाई मुख्य रूप से शुष्क समय में होती है, जल निकास वर्षा ऋतु में जलभराव के समय आवश्यक होता है।
प्रश्न 3. पौधों के लिए ‘पोटेशियम’ (K) पोषक तत्व के दो मुख्य कार्य लिखिए।
उत्तर: 1) यह पौधों में रोगों, कीटों और सूखे के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। 2) यह पत्तियों के रंध्रों (Stomata) के खुलने और बंद होने की क्रिया को नियंत्रित करता है जिससे जल संतुलन बना रहता है।
प्रश्न 4. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micro-nutrients) किसे कहते हैं? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर: वे पोषक तत्व जिनकी पौधों को अपने सामान्य जीवन चक्र को पूरा करने के लिए बहुत ही सूक्ष्म मात्रा (कम मात्रा) में आवश्यकता होती है। उदाहरण: लोहा (Fe), जस्ता (Zn), और बोरान (B)।
प्रश्न 5. खाद (Manure) और उर्वरक (Fertilizer) में दो बुनियादी अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 1) खाद पूरी तरह से प्राकृतिक और कार्बनिक होती है जो खेतों या गड्ढों में तैयार होती है। उर्वरक अकार्बनिक रासायनिक पदार्थ होते हैं जो कारखानों में मशीनों द्वारा बनते हैं। 2) खाद में सभी पोषक तत्व कम मात्रा में होते हैं, जबकि उर्वरक में विशिष्ट पोषक तत्व (जैसे नाइट्रोजन) प्रचुर मात्रा में होते हैं।
प्रश्न 6. हरी खाद (Green Manuring) क्या है? इसकी एक उपयुक्त फसल का नाम लिखिए।
उत्तर: मृदा में कार्बनिक पदार्थों और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने के लिए किसी दलहनी फसल को खेत में उगाकर फूल आने से पहले हल चलाकर मिट्टी में दबाकर सड़ाने की क्रिया को हरी खाद कहते हैं। उपयुक्त फसल: ढैंचा या सनई (Sunnhemp)।
प्रश्न 7. जैव उर्वरक (Bio-fertilizers) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: ये ऐसे उत्पाद हैं जिनमें जीवित सूक्ष्मजीव (जीवाणु, फफूंद या शैवाल) होते हैं। जब इन्हें बीजों या मिट्टी में मिलाया जाता है, तो ये वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके या अघुलनशील फास्फोरस को घोलकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं (जैसे राइजोबियम)।
प्रश्न 8. खरपतवार (Weeds) की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: वे अवांछित और बिना बोए पौधे जो किसी स्थान या खेत में मुख्य फसल के साथ बिना मर्जी के स्वतः उग आते हैं, और पोषक तत्वों, स्थान व प्रकाश के लिए मुख्य फसल से प्रतिस्पर्धा करके नुकसान पहुँचाते हैं।
प्रश्न 9. खरपतवारों के दो प्रमुख वितरण के गुण (विशेषताएं) लिखिए।
उत्तर: 1) खरपतवारों में अत्यधिक मात्रा में बीजों का उत्पादन होता है (जैसे जंगली चौलाई)। 2) इनके बीजों की जीवन क्षमता (Viability) बहुत लंबी होती है, ये मिट्टी में कई वर्षों तक दबे रहने के बाद भी अंकुरित हो सकते हैं।
प्रश्न 10. जैविक खरपतवार नियंत्रण (Biological Weed Control) क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर: किसी कीट, फफूंद या जीव के माध्यम से खरपतवार को नष्ट करने की क्रिया को जैविक नियंत्रण कहते हैं। उदाहरण: लैंटाना कैमरा खरपतवार को नष्ट करने के लिए ‘क्रोसिडोसेमा लैंटाना’ कीट का उपयोग करना या गाजर घास के लिए जाइगोग्राम बिक्सलोराटा कीट का प्रयोग।
प्रश्न 11. जैविक कीटनाशी (Bio-pesticides) से क्या आशय है? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर: वे नाशीकीट नियंत्रक जो जैविक स्रोतों (पौधों, जीवाणुओं या कवक) से तैयार किए जाते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचाते। उदाहरण: नीम का अर्क (एजाडिरैचटिन) या बीटी (Bacillus thuringiensis) पाउडर।
प्रश्न 12. धान की ‘एस.आर.आई.’ (SRI – System of Rice Intensification) विधि क्या है?
उत्तर: यह धान की खेती की एक आधुनिक विधि है जिसमें कम पानी, कम बीज दर और जैविक खादों के अधिक उपयोग से धान की सघन और उन्नत पैदावार ली जाती है। इसमें नर्सरी से बहुत छोटे (10-12 दिन के) पौधे रोपे जाते हैं।
प्रश्न 13. सोयाबीन की खेती में बीजोपचार (Seed Treatment) क्यों आवश्यक है?
उत्तर: बीजों को फफूंद जनित रोगों से बचाने के लिए थाइराम या कार्बेन्डाजिम से उपचारित करते हैं, और फिर नाइट्रोजन स्थिरीकरण बढ़ाने के लिए राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना आवश्यक है।
प्रश्न 14. मशरूम स्पॉन (Mushroom Spawn) किसे कहते हैं?
उत्तर: मशरूम के कवकजाल (Mycelium) को जब वैज्ञानिक तरीके से किसी अनाज के दानों (जैसे गेहूँ या ज्वार) पर कृत्रिम रूप से विकसित किया जाता है, तो उसे मशरूम का ‘स्पॉन’ या बीज कहते हैं।
प्रश्न 15. जहरीले मशरूम (Poisonous Mushrooms) की पहचान के दो लक्षण लिखिए।
उत्तर: 1) ये प्रायः अत्यधिक चमकीले, आकर्षक रंगों (जैसे गहरे लाल, पीले) के होते हैं। 2) इन्हें काटने या तोड़ने पर इनमें से अप्रिय तीखी गंध आती है या रंग बदलने लगता है।
प्रश्न 16. अलंकृत बागवानी (Ornamental Horticulture) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: उद्यान शास्त्र की वह शाखा जिसके अंतर्गत मानव मन की शांति, सौंदर्य, और वातावरण को आकर्षक बनाने के लिए सजावटी पौधों, लताओं, झाड़ियों, और मौसमी फूलों को उगाने और उनके प्रबंधन का अध्ययन किया जाता है।
प्रश्न 17. उद्यानों की ‘औपचारिक शैली’ (Formal Style) के दो मुख्य लक्षण लिखिए।
उत्तर: 1) पूरा उद्यान एक निश्चित ज्यामितीय योजना (वर्गाकार या आयताकार) में सममित (Symmetrical) रूप से बनाया जाता है। 2) इसमें केंद्रीय रास्ता, कटी हुई झाड़ियाँ (Topiary) और फव्वारे बिल्कुल बीच में आमने-सामने होते हैं।
प्रश्न 18. पौध प्रसारण (Plant Propagation) क्या है? इसके दो मुख्य प्रकार लिखिए।
उत्तर: पौधों की संख्या बढ़ाने या अपनी प्रजाति को बनाए रखने के लिए नई संतति तैयार करने की क्रिया को पौध प्रसारण कहते हैं। इसके दो प्रकार हैं: 1) लैंगिक प्रवर्धन (बीज द्वारा) 2) अलैंगिक या वानस्पतिक प्रवर्धन (कलम, गूटी आदि द्वारा)।
प्रश्न 19. वानस्पतिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) का क्या लाभ है?
उत्तर: इससे तैयार किए गए नए पौधे पूरी तरह से अपने मातृ पौधे के समान (True to type) होते हैं और इनमें बीज वाले पौधों की तुलना में बहुत जल्दी फल आना शुरू हो जाते हैं।
प्रश्न 20. पपीते के पौधों में ‘नर और मादा’ पौधों की समस्या को कैसे दूर किया जाता है?
उत्तर: चूंकि पपीता एकलिंगाश्रयी होता है, इसलिए बागों में फल प्राप्त करने के लिए 100 मादा पौधों के बीच कम से कम 10 नर पौधे परागण के लिए रखना आवश्यक है। आधुनिक ‘गाइनोडायोसियस’ किस्मों को उगाकर इस समस्या को कम किया जाता है।
प्रश्न 21. अंगूर की खेती में ‘सधाई’ (Training) की सबसे लोकप्रिय विधि कौन सा है?
उत्तर: पंडाल या बोअर (Bower) विधि। इस विधि में तारों का एक जाल (मंडप) बनाया जाता है जिस पर अंगूर की बेलें फैलाई जाती हैं, जिससे अधिकतम पैदावार मिलती है।
प्रश्न 22. ईसबगोल का औषधीय महत्व क्या है?
उत्तर: ईसबगोल की भूसी में प्रचुर मात्रा में लसदार म्यूसिलेज होता है, जिसका उपयोग पुरानी पेचिश, कब्ज, पेट की खराबी और बवासीर के इलाज में एक सुरक्षित प्राकृतिक रेचक (Laxative) के रूप में किया जाता है।
प्रश्न 23. लेमन घास (Lemon Grass) के तेल का मुख्य औद्योगिक उपयोग क्या है?
उत्तर: इसके तेल में ‘सिट्रल’ (Citral) पाया जाता है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से सुगंधित साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, इत्र (Perfume) और विटामिन ए बनाने में किया जाता है।
प्रश्न 24. रतनजोत (Jatropha curcas) का कृषि और ऊर्जा के क्षेत्र में क्या महत्व है?
उत्तर: इसके बीजों से प्राप्त तेल का प्रसंस्करण करके उच्च गुणवत्ता वाला बायोडीजल (Biodiesel) बनाया जाता है, जो पेट्रोलियम डीजल का एक बेहतरीन पर्यावरण अनुकूल विकल्प है।
प्रश्न 25. आलू की फसल में ‘मिट्टी चढ़ाना’ (Earthing up) क्यों आवश्यक है?
उत्तर: आलू के कंदों (Tubers) को सूर्य की सीधी धूप से बचाने के लिए मिट्टी चढ़ाई जाती है। यदि कंद धूप के संपर्क में आते हैं, तो उनमें ‘सोलेरिन’ नामक हरा विषैला पदार्थ बन जाता है जिससे आलू हरे और अखाद्य हो जाते हैं।
प्रश्न 26. टमाटर की दो प्रमुख उन्नत एवं हाइब्रिड (Hybrid) किस्मों के नाम लिखिए।
उत्तर: 1) अर्का रक्षक 2) पूसा रूबी या पूसा गौरव।
प्रश्न 27. कद्दू वर्गीय सब्जियों में ‘नर फूलों’ की संख्या कम करके ‘मादा फूलों’ को बढ़ाने के लिए किस पादप हार्मोन का छिड़काव करते हैं?
उत्तर: एन.ए.ए. (NAA – Naphthalene Acetic Acid) या इथरेल का सूक्ष्म मात्रा (200 ppm) में छिड़काव किया जाता है।
प्रश्न 28. लहसुन (Garlic) की फसल की दो उन्नत किस्मों के नाम लिखिए।
उत्तर: 1) जी-1 (यमुना सफेद) 2) जी-41 या एग्रीफाउंड पार्वती।
प्रश्न 29. मूंग और उड़द की फसलों का मुख्य रूप से फसल चक्र (Crop Rotation) में क्या महत्व है?
उत्तर: ये बहुत कम समय (60-70 दिन) में पकने वाली दलहनी फसलें हैं जिन्हें रबी और खरीफ के बीच ग्रीष्मकाल में उगाकर मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा और खेत की आय बढ़ाई जा सकती है।
प्रश्न 30. खरपतवारों द्वारा फसलों को होने वाले दो मुख्य नुकसान लिखिए।
उत्तर: 1) ये मुख्य फसल के हिस्से का पानी और खाद सोख लेते हैं जिससे फसल की वृद्धि रुक जाती है। 2) ये कई हानिकारक कीटों और बीमारियों के जीवाणुओं को आश्रय देते हैं।
भाग स: 3 अंक वाले लघु उत्तरीय प्रश्न (कुल: 15 प्रश्न)
प्रश्न 1. जल निकास की कमी (खेत में जलभराव) से भूमि और फसलों पर पड़ने वाले किन्हीं तीन विपरीत प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: खेत में लंबे समय तक पानी भरे रहने से निम्नलिखित नुकसान होते हैं:
1. मृदा में वायु संचार रुकना: मिट्टी के छिद्र पानी से भर जाते हैं जिससे ऑक्सीजन बाहर निकल जाती है। जड़ों को सांस लेने के लिए हवा नहीं मिलती और पौधे पीले पड़कर सूखने लगते हैं।
2. तापमान में गिरावट: जलभराव के कारण मिट्टी का तापमान बहुत कम हो जाता है, जिससे बीजों का अंकुरण रुक जाता है और जड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
3. हानिकारक लवणों का एकत्र होना: जलभराव के कारण भूमि के नीचे के हानिकारक लवण केशिकत्व (Capillarity) क्रिया द्वारा ऊपर आकर सतह पर जम जाते हैं जिससे भूमि ऊसर हो जाती है।
प्रश्न 2. पौधों में ‘नाइट्रोजन’ (N) पोषक तत्व की कमी के कोई तीन मुख्य लक्षण लिखिए।
उत्तर: नाइट्रोजन की कमी होने पर पौधों में निम्नलिखित स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं:
1. पत्तियों का पीला पड़ना (Chlorosis): सबसे पहले पौधे की नीचे की पुरानी पत्तियाँ हरी से पीली होने लगती हैं क्योंकि क्लोरोफिल का निर्माण रुक जाता है।
2. पौधे की वृद्धि रुकना: कोशिका विभाजन धीमा हो जाता है जिससे पौधा बौना रह जाता है और तना पतला व कड़ा हो जाता है।
3. कम कल्ले निकलना: अनाज वाली फसलों (जैसे धान, गेहूँ) में कल्ले (Tillering) बहुत कम निकलते हैं जिससे पैदावार में भारी कमी आती है।
प्रश्न 3. जैविक खादों (Organic Manures) के नियमित उपयोग से भूमि के भौतिक व रासायनिक गुणों में होने वाले तीन सुधारों को लिखिए।
उत्तर: गोबर की खाद या केंचुए की खाद के उपयोग से मिट्टी में निम्नलिखित सुधार होते हैं:
1. मृदा संरचना में सुधार: यह बलुई मिट्टी के कणों को आपस में बांधती है और चिकनी मिट्टी को भुरभुरी बनाती है जिससे वायु संचार बढ़ता है।
2. जल धारण क्षमता में वृद्धि: मिट्टी की पानी सोखने और उसे लंबे समय तक नमी के रूप में बनाए रखने की क्षमता बहुत बढ़ जाती है, जिससे सूखे का प्रभाव कम होता है।
3. लाभदायक सूक्ष्मजीवों की वृद्धि: यह मिट्टी में रहने वाले केंचुए और मित्र जीवाणुओं को भोजन प्रदान करती है जिससे भूमि की जैविक शक्ति बढ़ती है।
प्रश्न 4. खरपतवारों के वर्गीकरण के अंतर्गत ‘जीवन चक्र के आधार पर’ किन्हीं तीन वर्गों को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: जीवन अवधि के आधार पर खरपतवारों को तीन मुख्य वर्गों में बांटा जाता है:
1. एकवर्षीय खरपतवार (Annual Weeds): ये अपना जीवन चक्र (अंकुरण, वृद्धि और बीज उत्पादन) एक वर्ष या एक ऋतु के भीतर पूरा करके नष्ट हो जाते हैं। उदाहरण: जंगली जई, बथुआ।
2. द्विवर्षीय खरपतवार (Biennial Weeds): ये पहले वर्ष अपनी वानस्पतिक वृद्धि करते हैं और दूसरे वर्ष फूलों व बीजों का उत्पादन करके नष्ट होते हैं। उदाहरण: जंगली गाजर (Daucus carota)।
3. बहुवर्षीय खरपतवार (Perennial Weeds): ये पौधे कई वर्षों तक जीवित रहते हैं और बार-बार बीज बनाते हैं। इन्हें नष्ट करना कठिन होता है। उदाहरण: मोथा, कांस (Saccharum spontaneum)।
प्रश्न 5. गन्ने की खेती (Sugarcane Cultivation) के अंतर्गत बुआई की किन्हीं तीन प्रमुख विधियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर: गन्ने की बुआई निम्नलिखित विधियों द्वारा की जाती है:
1. समतल क्यारी विधि (Flat Bed Method): इस विधि में समतल खेत में 75-90 सेमी की दूरी पर उथली नालियां (Furrows) बनाई जाती हैं और गन्ने के टुकड़ों (Sets) को क्षैतिज रखकर मिट्टी से ढक दिया जाता है।
2. नाली विधि (Ridge and Furrow Method): भारी मिट्टी और तेज हवा वाले क्षेत्रों में खेत में गहरी नालियां और मेढ़ें बनाई जाती हैं। गन्ने को नालियों के अंदर बोया जाता है ताकि बाद में मिट्टी चढ़ाने पर पौधे गिरें नहीं।
3. ट्रेंच या खाई विधि (Trench Method): इसमें खेत में 20-25 सेमी गहरी और चौड़ी खाइयाँ खोदी जाती हैं। यह विधि गन्ने की बहुत ऊंची और अधिक पैदावार देने वाली फसल के लिए उपयुक्त है ताकि फसल तेज हवा में न गिरे।
प्रश्न 6. ओइस्टर या ढींगरी मशरूम (Oyster Mushroom) उगाने के तीन प्रमुख चरणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: ओइस्टर मशरूम उगाना बहुत आसान है, इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है:
1. माध्यम (भूसे) का उपचार: गेहूँ या धान के सूखे भूसे को साफ पानी में भिगोकर उसे रसायनों (बाविस्टिन और फॉर्मेलिन) द्वारा या भाप में उबालकर पूरी तरह कीटाणुरहित (Sterilize) किया जाता है।
2. बीजाई (Spawning): उपचारित भूसे की नमी जब 65-70% रह जाए, तो उसे पॉलिथीन के बैगों में मशरूम के बीज (स्पॉन) के साथ परतों में भरा जाता है और बैग के मुंह को बांध दिया जाता है।
3. कवकजाल की वृद्धि (Spawn Running): इन बैगों को अंधेरे और नम कमरे (तापमान 22-28°C) में रखा जाता है। 15-20 दिनों में भूसा सफेद कवकजाल से ढक जाता है, जिसके बाद पॉलिथीन को हटा दिया जाता है और मशरूम बाहर निकलने लगते हैं।
प्रश्न 7. अलंकृत बागवानी में उद्यानों की ‘अनौपचारिक या प्राकृतिक शैली’ (Informal Style) की तीन मुख्य विशेषताएं लिखिए।
उत्तर: अनौपचारिक शैली (जैसे जापानी उद्यान) की तीन विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
1. प्राकृतिक रूप: इसमें किसी भी ज्यामितीय रेखा (वर्गाकार/सर्कल) का उपयोग नहीं होता। रास्ते, झाड़ियाँ और पानी के स्रोत टेढ़े-मेढ़े और प्राकृतिक जंगलों की तरह बनाए जाते हैं।
2. असममित संतुलन (Asymmetrical Balance): इसमें दोनों तरफ वस्तुएं समान नहीं होतीं। यदि एक तरफ बड़ा पेड़ है तो दूसरी तरफ छोटी झाड़ियों का समूह बनाकर प्राकृतिक संतुलन बनाया जाता है।
3. प्राकृतिक तत्वों का समावेशन: इसमें कृत्रिम फव्वारों के स्थान पर प्राकृतिक झरने, बड़ी चट्टानें (Rockery), प्राकृतिक झीलें और मुड़ी हुई लकड़ी के पुलों का उपयोग किया जाता है।
प्रश्न 8. पौध प्रवर्धन के अंतर्गत ‘कलम लगाना’ (Stem Cutting) क्या है? इसे प्रभावित करने वाले तीन कारकों को लिखिए।
उत्तर:कलम लगाना: मातृ पौधे के तने या शाखा के एक टुकड़े (20-25 सेमी लंबी) को काटकर जब उसे अनुकूल परिस्थितियों में मिट्टी में लगाया जाता है ताकि उसमें नई जड़ें और पत्तियाँ निकल आएं, तो इसे कलम लगाना कहते हैं (जैसे गुलाब, अंगूर)।
प्रभावित करने वाले कारक:
1. शाखा की परिपक्वता: कलम हमेशा स्वस्थ और मध्यम परिपक्व लकड़ी (Semi-hardwood या Hardwood) से लेनी चाहिए। बहुत कोमल शाखाएं सड़ जाती हैं।
2. वातावरण की नमी और तापमान: कलमों में जड़ निकलने के लिए उच्च आर्द्रता (80-90%) और मध्यम तापमान आवश्यक है ताकि कलम सूखे नहीं।
3. रूटिंग हार्मोन का उपयोग: कलम के निचले हिस्से को आई.बी.ए. (IBA – Indole Butyric Acid) हार्मोन में डुबोकर लगाने से जड़ें बहुत तेजी से और घनी निकलती हैं।
प्रश्न 9. अश्वगंधा (Withania somnifera) की खेती के लिए भूमि की तैयारी, बीज दर और उसकी कटाई (Harvesting) की उन्नत विधि लिखिए।
उत्तर: 1. भूमि की तैयारी: इसके लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है। खेत की 2-3 बार गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बना लिया जाता है और जलभराव रोकने के लिए पाटा लगाया जाता है।
2. बीज दर: एक हेक्टेयर खेत की बुआई के लिए लगभग 10 से 12 किलोग्राम साफ बीजों की आवश्यकता होती है। बुआई छिड़काव विधि या कतारों में 30 सेमी की दूरी पर की जाती है।
3. कटाई और खुदाई: बुआई के लगभग 150-180 दिन बाद जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़कर सूखने लगें और फल लाल हो जाएं, तब जड़ों की खुदाई की जाती है। जड़ों को उखाड़कर तने से अलग कर लिया जाता है और सुखाकर बाजार में बेचा जाता है।
प्रश्न 10. व्यवसायिक फसलों के अंतर्गत ‘खस घास’ (Vetiver) के आर्थिक उपयोग और इसकी तेल निकालने की विधि पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:आर्थिक उपयोग: खस एक बहुवर्षीय सुगंधित घास है। इसकी जड़ों से अत्यंत मूल्यवान सुगंधित तेल प्राप्त होता है जिसका उपयोग इत्र, साबुन और शर्बत बनाने में होता है। इसकी जड़ों से गर्मियों में कमरों को ठंडा रखने वाली टट्टियाँ (Screens) भी बनाई जाती हैं। यह मिट्टी के कटाव को भी रोकती है।
तेल निकालने की विधि: खस की जड़ों को खोदकर साफ किया जाता है और छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। इसके बाद भाप आसवन (Steam Distillation) विधि द्वारा जड़ों से तेल निकाला जाता है। भाप जड़ों के तेल को अपने साथ उड़ाकर कंडेंसर में ले जाती है जहाँ ठंडा होने पर तेल पानी के ऊपर तैरने लगता है और उसे अलग कर लिया जाता है।
प्रश्न 11. बैंगन की खेती (Brinjal Cultivation) का वानस्पतिक नाम, उन्नत किस्में और इसकी ‘फल छेदक’ कीट की समस्या का समाधान लिखिए।
उत्तर: 1. वानस्पतिक नाम: सोलेनम मेलोन्गेना (Solanum melongena)। यह सोलेनेसी कुल की फसल है।
2. उन्नत किस्में: पंत सम्राट, पूसा पर्पल क्लस्टर, और अर्का नवनीत (हाइब्रिड)।
3. तनाव एवं फल छेदक कीट (Shoot and Fruit Borer) नियंत्रण: यह बैंगन का सबसे खतरनाक कीट है। इसकी सूँडी तने और फलों के अंदर घुसकर उन्हें अंदर से खाकर नष्ट कर देती है।
समाधान: प्रभावित फल और तनों को तोड़कर जमीन में दबा देना चाहिए। खेत में ‘फेरोमोन ट्रैप’ लगाने चाहिए। कीट का प्रकोप होने पर स्पिनोसैड या साइपरमेथ्रिन रसायन का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
प्रश्न 12. कद्दू वर्गीय सब्जियों (जैसे लौकी, करेला) में ‘लिंग अनुपात का नियंत्रण’ क्या है? इसे विस्तार से समझाइए।
उत्तर: कद्दू वर्गीय सब्जियों (Cucurbits) में नर और मादा फूल एक ही पौधे पर अलग-अलग स्थानों पर आते हैं। प्राकृतिक रूप से पौधों पर नर फूलों की संख्या मादा फूलों की तुलना में बहुत अधिक (प्रायः 10:1) होती है। अधिक नर फूल होने से फल कम बनते हैं और पैदावार घट जाती है।
नियंत्रण विधि: मादा फूलों की संख्या बढ़ाकर पैदावार बढ़ाने की क्रिया को लिंग अनुपात नियंत्रण कहते हैं। इसके लिए जब पौधों पर 2 से 4 पत्तियाँ आ जाएं, तब पादप हार्मोन जैसे नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (NAA) 100-200 पीपीएम या जिबरेलिक एसिड का छिड़काव किया जाता है। इससे मादा फूलों की संख्या बढ़ती है और फल अधिक बनते हैं।
प्रश्न 13. कम्पोस्ट खाद बनाने की ‘बैंगलोर विधि’ (Bangalore Method) की तीन मुख्य विशेषताएं लिखिए।
उत्तर: यह विधि प्रसिद्ध वैज्ञानिक एल. एन. आचार्य द्वारा विकसित की गई थी। इसकी तीन विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
1. अवायवीय प्रक्रिया (Anaerobic): यह एक बंद गड्ढे में हवा (ऑक्सीजन) की अनुपस्थिति में पूरी होती है। गड्ढे को भरने के बाद ऊपर से मिट्टी और गोबर से पूरी तरह सील कर दिया जाता है।
2. पलटने की आवश्यकता नहीं: अन्य विधियों (जैसे इंदौर विधि) की तरह इसमें कचरे को बार-बार पलटने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे श्रम और समय की बचत होती है।
3. पोषक तत्वों की कम हानि: बंद रहने के कारण इसमें से अमोनिया या अन्य गैसें उड़कर बाहर नहीं जातीं, जिससे नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व सुरक्षित बने रहते हैं। खाद 6-8 महीने में तैयार होती है।
प्रश्न 14. नर्सरी तैयार करने की ‘डेपोग विधि’ (Depog Method) क्या है? इसके दो लाभ लिखिए।
उत्तर: यह धान की पौध (नर्सरी) तैयार करने की एक आधुनिक विधि है जो मूल रूप से फिलीपींस से भारत आई है। इसमें बीजों को मिट्टी के बिना किसी पक्के फर्श, प्लास्टिक की शीट या केले के पत्तों पर घनी परत में बिछाकर केवल पानी छिड़ककर उगाया जाता है।
दो प्रमुख लाभ:
1. कम समय में तैयारी: इस विधि से धान की पौध मात्र 11 से 14 दिनों के भीतर रोपाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है, जबकि पारंपरिक विधि में 25-30 दिन लगते हैं।
2. कम क्षेत्रफल की आवश्यकता: एक हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए मात्र 25-30 वर्ग मीटर क्षेत्रफल की नर्सरी पर्याप्त होती है। पौधे आसानी से मैट की तरह उखड़ जाते हैं और जड़ें नहीं टूटतीं।
प्रश्न 15. लहसुन की व्यावसायिक खेती के लिए जलवायु, रोपण की दूरी और प्रति हेक्टेयर औसतन उपज (Yield) का विवरण दीजिए।
उत्तर:जलवायु: लहसुन (Allium sativum) एक रबी मौसम की फसल है। इसकी वानस्पतिक वृद्धि के लिए ठंडी और नम जलवायु की आवश्यकता होती है, जबकि कंद (Bulbs) बनते और पकते समय शुष्क और गर्म मौसम आवश्यक है।
रोपण की दूरी: लहसुन की कलियों (Cloves) को कतारों में बोया जाता है। कतार से कतार की दूरी 15 सेमी और कली से कली के बीच की दूरी 8 से 10 सेमी रखनी चाहिए। बुआई की गहराई 3-4 सेमी होनी चाहिए।
औसत उपज: उन्नत सस्य क्रियाओं और सही देखरेख के द्वारा लहसुन की औसत पैदावार 100 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है।
भाग द: 4 अंक वाले दीर्घ उत्तरीय व विश्लेषणात्मक प्रश्न (कुल: 10 प्रश्न)
प्रश्न 1. जल निकास की ‘पृष्ठीय (सतही) नालियों’ और ‘भूमिगत (अंडरग्राउंड) नालियों’ वाली विधियों का तुलनात्मक वर्णन कीजिए। कौन सी विधि अधिक वैज्ञानिक और लाभदायक है? चार कारणों सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: जल निकास की दो मुख्य विधियाँ हैं जिनका तुलनात्मक विवरण नीचे दिया गया है:
1. पृष्ठीय या सतही जल निकास (Surface Drainage): इस विधि में खेत की सतह पर ढाल के अनुसार खुली नालियाँ खोदी जाती हैं। यह विधि सस्ती है और इसे आसानी से बनाया जा सकता है, परंतु खुली नालियों के कारण खेत का क्षेत्रफल कम हो जाता है, कृषि यंत्रों को चलाने में बाधा आती है और नालियों की बार-बार सफाई करनी पड़ती है।
2. भूमिगत जल निकास (Sub-surface Drainage): इस विधि में जमीन के अंदर एक निश्चित गहराई पर कंक्रीट, प्लास्टिक या टाइल्स के खोखले पाइप (Tile Drains) बिछाए जाते हैं, जो अतिरिक्त पानी को सोखकर बाहर निकाल देते हैं। ऊपर से मिट्टी समतल रहती है जिससे पूरी भूमि पर खेती की जा सकती है।
भूमिगत विधि अधिक वैज्ञानिक और लाभदायक है, जिसके चार मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. कृषि क्षेत्रफल की बचत: खुली नालियों की तरह इसमें खेत की भूमि बेकार नहीं जाती, जिससे पूरे 100% क्षेत्रफल पर फसल उगाई जा सकती है।
2. कृषि कार्यों में सुगमता: खेत समतल रहने के कारण ट्रैक्टर, थ्रेशर और अन्य आधुनिक कृषि यंत्रों को चलाने में कोई रुकावट नहीं आती।
3. मृदा क्षरण (Soil Erosion) पर रोक: खुली नालियों में पानी तेज बहने से उपजाऊ मिट्टी बह जाती है, जबकि भूमिगत विधि में पानी रिसकर अंदर जाता है जिससे मिट्टी का कटाव बिल्कुल नहीं होता।
4. स्थायित्व और कम रखरखाव: एक बार पाइप सही से बिछ जाने के बाद ये कई वर्षों तक बिना किसी टूट-फूट के निरंतर कार्य करते हैं और इनमें खरपतवार उगने या नाली टूटने की समस्या नहीं होती।
प्रश्न 2. पौधों में ‘फास्फोरस’ (P) पोषक तत्व का क्या महत्व है? इसकी कमी के चार प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए तथा इसकी पूर्ति के लिए दो उर्वरकों के नाम लिखिए।
उत्तर:फास्फोरस का महत्व: फास्फोरस को पौधों का ‘जीवन की कुंजी’ (Key to Life) कहा जाता है। यह पौधों में ऊर्जा स्थानांतरण (ATP का निर्माण), जड़ों के गहरे विकास, और कोशिकाओं के विभाजन के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह फसलों को समय पर पकाने और दानों की चमक व वजन बढ़ाने में सहायक है।
कमी के चार प्रमुख लक्षण:
1. जड़ों का विकास रुकना: फास्फोरस की कमी से पौधों की प्राथमिक और द्वितीयक जड़ों का विकास बहुत कमजोर हो जाता है, जिससे पौधा मिट्टी से पोषक तत्व नहीं सोख पाता।
2. पत्तियों का रंग बदलना (बैंगनी/नीला होना): पुरानी पत्तियों के किनारे और निचला भाग गहरा हरा, नीला या बैंगनी (Anthocyanin पिगमेंट के कारण) होने लगता है।
3. दाना न बनना: फल और फूलों का निर्माण बहुत कम होता है, अनाज की बालियों में दाने पूरी तरह नहीं भरते और फसल देर से पकती है।
4. पौधे का ढांचा कमजोर होना: पौधों के तने पतले रह जाते हैं और कल्ले बहुत कम निकलते हैं।
पूर्ति के लिए दो प्रमुख उर्वरक: 1) सिंगल सुपर फास्फेट (SSP – 16% P₂O₅) 2) डाई-अमोनियम फास्फेट (DAP – 46% P₂O₅)।
प्रश्न 3. खरपतवार नियंत्रण की ‘रासायनिक विधि’ (Chemical Weed Control) क्या है? इसके दो प्रमुख लाभ और दो सीमाएं (सावधानियां) लिखिए। किन्हीं दो व्यावसायिक खरपतवारनाशी रसायनों के नाम और उपयोग लिखिए।
उत्तर:रासायनिक विधि: खेत में मुख्य फसल को नुकसान पहुँचाए बिना अवांछित खरपतवारों को नष्ट करने के लिए विशिष्ट रसायनों (Herbicides/Weedicides) का छिड़काव करने की क्रिया को रासायनिक नियंत्रण कहते हैं।
दो प्रमुख लाभ:
1. कम लागत और तीव्र नियंत्रण: मजदूरों द्वारा खुरपी से निंदाई करने की तुलना में रसायनों का छिड़काव बहुत सस्ता होता है और कम समय में बड़े क्षेत्रफल से खरपतवार साफ हो जाते हैं।
2. जड़ों को नुकसान नहीं: फसलों की सघन कतारों में जहाँ खुरपी चलाने से मुख्य फसल की जड़ों को चोट पहुँच सकती है, वहाँ रासायनिक छिड़काव सुरक्षित रहता है।
दो सीमाएं/सावधानियां:
1. पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव: रसायनों के लगातार उपयोग से मित्र कीट नष्ट होते हैं, मिट्टी की जैविक शक्ति कम होती है और मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
2. सटीक मात्रा की आवश्यकता: यदि रसायन की मात्रा निर्धारित डोज से थोड़ी भी अधिक हो जाए, तो मुख्य फसल पूरी तरह जलकर नष्ट हो सकती है।
दो प्रमुख रसायन और उपयोग:
1. आइसोप्रोट्यूरॉन (Isoproturon): इसका उपयोग गेहूँ के मामा (Phalaris minor) खरपतवार को नष्ट करने के लिए गेहूँ की फसल में किया जाता है।
2. एट्राजीन (Atrazine): इसका उपयोग मक्का, ज्वार और गन्ने के खेतों में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के जमाव को रोकने के लिए अंकुरण से पहले किया जाता है।
प्रश्न 4. धान (चावल) की उन्नत वैज्ञानिक खेती का निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत सविस्तार वर्णन कीजिए:
(a) वानस्पतिक नाम एवं कुल (b) बीज दर एवं बीजोपचार (c) दो उन्नत किस्में (d) प्रति हेक्टेयर औसतन उपज।
उत्तर: धान (Rice) भारत की सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। इसकी वैज्ञानिक खेती का विवरण इस प्रकार है:
(a) वानस्पतिक नाम एवं कुल: धान का वानस्पतिक नाम ओराइजा सैटाइवा (Oryza sativa) है और यह ग्रेमिनी (Poaceae) कुल के अंतर्गत आती है।
(b) बीज दर एवं बीजोपचार:
– सामान्य रोपाई विधि के लिए: 35 से 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होते हैं।
– हाइब्रिड (संकर) किस्मों के लिए: 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज दर लगती है।
– बीजोपचार: बीजों को बोने से पहले 10% नमक के घोल में डुबोकर हल्के तैरने वाले थोथे बीजों को अलग कर देते हैं। इसके बाद फफूंद जनित रोगों (ब्लास्ट रोग) से बचाव के लिए एग्रोसन या बाविस्टिन (2 ग्राम/किग्रा) से उपचारित करते हैं।
(c) दो उन्नत किस्में: 1) आई.आर.-64 (IR-64) 2) जया (जिसे भारत का जादुई धान कहा जाता है) या पूसा बासमती-1121।
(d) प्रति हेक्टेयर औसतन उपज: उन्नत कृषि क्रियाओं, सही उर्वरक प्रबंधन और समय पर सिंचाई द्वारा सामान्य किस्मों की औसत उपज 40 से 50 क्विंटल और संकर (हाइब्रिड) किस्मों की पैदावार 60 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है।
प्रश्न 5. सोयाबीन (Glycine max) की खेती का निम्नलिखित चार शीर्षकों के अंतर्गत विस्तृत विवरण दीजिए:
(a) भूमि का चयन एवं तैयारी (b) बुआई का समय एवं कतारों की दूरी (c) दो नाशीकीट एवं रोग (d) उपज एवं महत्व।
उत्तर: सोयाबीन को ‘पीला सोना’ भी कहा जाता है क्योंकि यह तेल और प्रोटीन दोनों का प्रचुर स्रोत है।
(a) भूमि का चयन एवं तैयारी: इसके लिए अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ दोमट या मध्यम काली मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है। खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए। गर्मी में एक गहरी जुताई के बाद वर्षा शुरू होने पर 2-3 बार हैरो या कल्टीवेटर चलाकर पाटा लगा देते हैं ताकि मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जाए।
(b) बुआई का समय एवं कतारों की दूरी: मानसून की पहली अच्छी वर्षा (लगभग 75-100 मिमी) होने पर जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बुआई पूरी कर लेनी चाहिए। कतार से कतार की दूरी 30 से 45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 4 से 5 सेमी रखनी चाहिए। बुआई की गहराई 3 सेमी सर्वोत्तम है।
(c) दो नाशीकीट एवं रोग:
– कीट: गर्डल बीटल (चक्र भृंग) – इसकी सूँडी तने को अंदर से काटकर सुखा देती है। नियंत्रण के लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल का छिड़काव करते हैं।
– रोग: पीला मोज़ेक वायरस (Yellow Mosaic) – पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। यह सफेद मक्खी द्वारा फैलता है, जिसके नियंत्रण के लिए थायोमेथोक्सम का छिड़काव करते हैं।
(d) उपज एवं महत्व: सोयाबीन के बीजों में लगभग 40-42% उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन और 20% तेल पाया जाता है। इसकी औसत पैदावार 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है।
प्रश्न 6. मशरूम की खेती (Mushroom Cultivation) के क्या लाभ हैं? व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली खाने योग्य मशरूम की किन्हीं तीन प्रजातियों के नाम लिखिए तथा मशरूम घर की स्वच्छता के चार नियम बताइए।
उत्तर: मशरूम एक कवक (Fungus) है जिसका उपयोग सब्जी के रूप में होता है।
मशरूम खेती के प्रमुख लाभ: 1) यह कृषि अपशिष्टों (भूसे) का सर्वोत्तम पुनर्चक्रण करके मूल्यवान भोजन में बदलता है। 2) इसे घर के अंदर (Vertical Farming) उगाया जा सकता है, जिससे भूमिहीन किसानों और महिलाओं के लिए रोजगार का अच्छा जरिया मिलता है। 3) यह विटामिन्स, खनिज और प्रोटीन से भरपूर एक पौष्टिक भोजन है जिसमें वसा और कार्बोहाइड्रेट बहुत कम होते हैं।
तीन प्रमुख खाने योग्य प्रजातियां: 1) सफेद बटन मशरूम (Agaricus bisporus) 2) ओइस्टर या ढींगरी मशरूम (Pleurotus spp.) 3) पुआल (पैडी स्ट्रॉ) मशरूम (Volvariella volvacea)।
मशरूम घर (Production Room) की स्वच्छता के चार नियम:
1. कमरे में प्रवेश करने से पहले हाथों और पैरों को साफ पानी और सैनिटाइजर या डेटॉल के घोल से धोना अनिवार्य होना चाहिए।
2. कमरे की दीवारों और फर्श पर प्रत्येक फसल चक्र से पहले 2% फॉर्मेलिन के घोल का छिड़काव करके पूरी तरह कीटाणुरहित (Disinfect) करना चाहिए।
3. हवा और वेंटिलेशन के रास्तों पर बारीक जाली होनी चाहिए ताकि बाहरी मक्खियाँ और कीड़े अंदर न घुस सकें।
4. यदि किसी बैग में काला या हरा मोल्ड (कवक संक्रमण) दिखाई दे, तो उस बैग को तुरंत कमरे से बाहर निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए।
प्रश्न 7. पौध प्रसारण (Plant Propagation) की वानस्पतिक विधियों के अंतर्गत ‘गूटी बांधना’ (Air Layering) और ‘ग्राफ्टिंग’ (Grafting) की प्रक्रियाओं का चित्र/विवरण सहित सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर: वानस्पतिक प्रवर्धन द्वारा नए पौधे हूबहू मातृ पौधे के गुणों वाले बनते हैं। दो प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं:
1. गूटी बांधना या हवाई दाब (Air Layering): यह विधि मुख्य रूप से नींबू, लीची और अनार में अपनाई जाती है। इसके अंतर्गत पौधे की एक वर्ष पुरानी पेंसिल जितनी मोटी स्वस्थ शाखा का चयन किया जाता है। उस शाखा पर पत्तियों के पास से लगभग 2-3 सेमी चौड़ा छल्ला (Bark या छाल) पूरी तरह हटा दिया जाता है। इस कटे हुए भाग पर नम स्फैगनम घास (Sphagnum Moss) रखकर उसे पॉलिथीन की शीट से लपेटकर दोनों सिरों को सुतली से कसकर बांध दिया जाता है। 40-50 दिनों में पॉलिथीन के अंदर से सफेद जड़ें दिखाई देने लगती हैं, जिसके बाद शाखा को नीचे से काटकर नए गमले या खेत में रोप दिया जाता है।
2. ग्राफ्टिंग या कलम बंधन (Grafting): इस विधि में दो अलग-अलग पौधों के भागों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि वे आगे चलकर एक ही पौधे के रूप में विकसित हो सकें। नीचे वाला भाग जिसकी जड़ें मजबूत होती हैं और मिट्टी में रहता है, उसे मूलवृंत (Rootstock) कहते हैं। ऊपर वाला भाग जो किसी उन्नत किस्म के पौधे की टहनी होती है और जिसमें अच्छे फल के गुण होते हैं, उसे सांकुर शाखा (Scion) कहते हैं। दोनों के कैम्बियम (Cambium) भाग को आपस में मिलाकर ग्राफ्टिंग टेप से कसकर बांध दिया जाता है। कुछ समय बाद दोनों के ऊतक आपस में जुड़ जाते हैं। यह विधि आम (इनआर्चिंग/विप ग्राफ्टिंग) में बहुत लोकप्रिय है।
प्रश्न 8. आम (Mangifera indica) की व्यावसायिक बागवानी का निम्नलिखित चार शीर्षकों के अंतर्गत विस्तृत विवरण दीजिए:
(a) प्रवर्धन की विधि एवं गड्ढों का आकार (b) चार उन्नत किस्में (c) ‘एकान्तर फलन’ (Alternate Bearing) की समस्या एवं नियंत्रण (d) प्रति पेड़ औसतन उपज।
उत्तर: आम को ‘फलों का राजा’ कहा जाता है। इसकी उन्नत बागवानी का विवरण इस प्रकार है:
(a) प्रवर्धन की विधि एवं गड्ढों का आकार: आम का व्यावसायिक प्रवर्धन वानस्पतिक विधि द्वारा होता है, जिसमें वेनियर ग्राफ्टिंग (Veneer Grafting), इनआर्चिंग (Inarching) या एपिकोटाइल ग्राफ्टिंग मुख्य हैं। बाग लगाने के लिए गर्मी के दिनों में 10 × 10 मीटर की दूरी पर 1 × 1 × 1 मीटर आकार के गहरे गड्ढे खोदे जाते हैं। इन गड्ढों को उपजाऊ मिट्टी, गोबर की खाद (FYM) और सुपर फास्फेट के मिश्रण से भरकर पौधे लगाए जाते हैं।
(b) चार उन्नत किस्में: 1) दशहरी 2) लंगड़ा 3) हापुस (अल्फांसो) 4) आम्रपाली (यह एक बौनी किस्म है जो सघन बागवानी के लिए उपयुक्त है)।
(c) एकान्तर फलन (Alternate Bearing) की समस्या व समाधान: आम के पेड़ों में एक वर्ष बहुत अधिक फल आते हैं (जिसे On Year कहते हैं) और उसके अगले वर्ष बहुत ही कम या बिल्कुल फल नहीं आते (जिसे Off Year कहते हैं)। इस समस्या को एकान्तर फलन कहते हैं।
नियंत्रण: अक्टूबर-नवंबर के महीने में पेड़ों की जड़ों के पास मिट्टी में पैकलोबुट्राजोल (Paclobutrazol / कल्टार) रसायन का छिड़काव/प्रयोग करने से प्रत्येक वर्ष नियमित रूप से फल प्राप्त किए जा सकते हैं।
(d) प्रति पेड़ औसतन उपज: एक पूर्ण विकसित (10-12 वर्ष पुराने) आम के पेड़ से उसकी किस्म के आधार पर प्रति वर्ष औसतन 500 से 1000 फल (लगभग 150 से 200 किलोग्राम) प्राप्त होते हैं।
प्रश्न 9. औषधीय पौधों के अंतर्गत ‘सफेद मूसली’ (Chlorophytum borivilianum) की खेती का निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत सविस्तार वर्णन कीजिए:
(a) मिट्टी एवं जलवायु (b) प्रवर्धन का माध्यम एवं बीज दर (c) खुदाई एवं कंदों का प्रसंस्करण (Processing) (d) औषधीय महत्व।
उत्तर: सफेद मूसली एक अत्यंत मूल्यवान औषधीय फसल है जिसकी मांग वैश्विक बाजार में बहुत अधिक है।
(a) मिट्टी एवं जलवायु: इसकी खेती के लिए प्रचुर कार्बनिक पदार्थों वाली भुरभुरी, उपजाऊ बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है जिसका पीएच 6.5 से 7.5 हो। भारी चिकनी मिट्टी इसके कंदों के विकास के लिए उपयुक्त नहीं है। जलवायु गर्म और नम होनी चाहिए। वर्षा ऋतु (जून से अक्टूबर) इसकी वृद्धि के लिए सर्वोत्तम समय है।
(b) प्रवर्धन का माध्यम एवं बीज दर: इसका प्रवर्धन मुख्य रूप से इसके भूमिगत मांसल कंदों या उंगलियों (Fingers/Tubers) द्वारा किया जाता है जिसमें तने का कुछ भाग (Crown) जुड़ा होना चाहिए। एक हेक्टेयर की बुआई के लिए लगभग 400 से 500 किलोग्राम स्वस्थ कंदों की आवश्यकता होती है। इन्हें मेढ़ों (Ridges) पर बोया जाता है।
(c) खुदाई एवं कंदों का प्रसंस्करण (Processing): बुआई के लगभग 80-90 दिन बाद पत्तियाँ पीली होकर सूख जाती हैं और गिर जाती हैं, परंतु कंदों को जमीन के अंदर परिपक्व होने के लिए जनवरी-फरवरी तक छोड़ दिया जाता है। खुदाई के बाद कंदों के गुच्छों को साफ पानी से धोया जाता है। प्रसंस्करण के लिए कंदों की ऊपर की पतली त्वचा (छिलका) को चाकू से छीलकर अलग कर दिया जाता है और फिर इन्हें धूप में 3-4 दिनों तक तब तक सुखाया जाता है जब तक कि ये कड़े और सफेद न हो जाएं।
(d) औषधीय महत्व: इसकी सूखी सफेद जड़ों में ‘सैपोनिन’ (Saponin) नामक सक्रिय तत्व पाया जाता है। यह एक शक्तिशाली प्राकृतिक टॉनिक है जिसका उपयोग शारीरिक कमजोरी दूर करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, और कई प्रकार की शक्तिवर्धक आयुर्वेदिक दवाइयां (जैसे च्यवनप्राश और मूसली पाक) बनाने में किया जाता है।
प्रश्न 10. आलू (Solanum tuberosum) की व्यावसायिक खेती का निम्नलिखित चार शीर्षकों के अंतर्गत सविस्तार वर्णन कीजिए:
(a) बीज कंदों का चयन एवं प्रति हेक्टेयर मात्रा (b) बुआई की विधि एवं दूरी (c) दो प्रमुख रोग एवं उनका नियंत्रण (d) प्रति हेक्टेयर औसतन उपज।
उत्तर: आलू को ‘सब्जियों का राजा’ कहा जाता है, यह रबी मौसम की एक प्रमुख नगदी फसल है।
(a) बीज कंदों का चयन एवं मात्रा: बुआई के लिए हमेशा रोगमुक्त, प्रमाणित और मध्यम आकार के कंदों (वजन लगभग 30-40 ग्राम, व्यास 3-4 सेमी) का चयन करना चाहिए जिनमें कम से कम 2-3 सक्रिय आँखें (Eyes) हों। एक हेक्टेयर खेत की बुआई के लिए औसतन 20 से 25 क्विंटल बीज कंदों की आवश्यकता होती है।
(b) बुआई की विधि एवं दूरी: आलू की बुआई मुख्य रूप से मेढ़ और नाली (Ridge and Furrow) विधि द्वारा की जाती है। कतार से कतार (मेढ़ से मेढ़) की दूरी 45 से 60 सेमी और कंद से कंद के बीच की दूरी 15 से 20 सेमी रखनी चाहिए। कंदों को मिट्टी में 6-8 सेमी की गहराई पर बोया जाता है। बुआई के 30-40 दिन बाद जब पौधे बड़े हो जाएं, तो मेढ़ों पर और मिट्टी चढ़ाना (Earthing up) अनिवार्य है।
(c) दो प्रमुख रोग एवं उनका नियंत्रण:
1. अगेती झुलसा रोग (Early Blight): यह फफूंद के कारण होता है। पत्तियों पर कत्थई रंग के गोल छल्लेदार धब्बे बन जाते हैं जिससे पत्तियाँ सूख जाती हैं।
नियंत्रण: मैंकोज़ेब या रिडोमिल (2 ग्राम/लीटर) का छिड़काव करना चाहिए।
2. पिछेती झुलसा रोग (Late Blight): यह सबसे विनाशकारी रोग है जो नम और कोहरे वाले मौसम में तेजी से फैलता है। पत्तियों के किनारे काले पड़ जाते हैं और पूरी फसल जलकर सड़ जाती है। कंद भी सड़ने लगते हैं।
नियंत्रण: कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या फफूंदनाशी रसायनों का 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव आवश्यक है।
(d) प्रति हेक्टेयर औसतन उपज: उन्नत सस्य क्रियाओं, सही खाद-उर्वरक प्रबंधन और समय पर सिंचाई द्वारा आलू की औसत पैदावार 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है। कुफरी ज्योति और कुफरी बहार इसकी लोकप्रिय किस्में हैं।







